महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 794, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंऋषि बोले— राजन्! राजाका दिया हुआ दान ऊपरसे मधुके समान मीठा जान पड़ता है, परंतु परिणाममें विषके समान भयंकर हो जाता है। इस बातको जानते हुए भी आप क्यों हमें प्रलोभनमें डाल रहे हैं ।। ३१ ।।
क्षेत्रं हि दैवतमिदं ब्राह्मणान् समुपाश्रितम् ।
अमलो ह्येष तपसा प्रीतः प्रीणाति देवताः ।। ३२ ।।
ब्राह्मणोंका शरीर देवताओंका निवासस्थान है, उसमें सभी देवता विद्यमान रहते हैं। यदि ब्राह्मण तपस्यासे शुद्ध एवं संतुष्ट हो तो वह सम्पूर्ण देवताओंको प्रसन्न करता है ।। ३२ ।।
अह्नापहि तपो जातु ब्राह्मणस्योपजायते ।
तद् दाव इव निर्दह्यात् प्राप्तो राजप्रतिग्रहः ।। ३३ ।।
ब्राह्मण दिनभरमें जितना तप संग्रह करता है, उसको राजाका दिया हुआ दान वनको दग्ध करनेवाले दावानलकी भाँति नष्ट कर डालता है ।। ३३ ।।
कुशलं सह दानेन राजन्नस्तु सदा तव ।
अर्थिभ्यो दीयतां सर्वमित्युक्त्वान्येन ते ययुः ।। ३४ ।।
राजन्! इस दानके साथ ही आप सदा सकुशल रहें और यह सारा दान आप उन्हींको दें जो आपसे इन वस्तुओंको लेना चाहते हों। ऐसा कहकर वे दूसरे मार्गसे चल दिये ।। ३४ ।।
ततः प्रचोदिता राज्ञा वनं गत्वाश्य मन्त्रिणः ।
प्रचीयोदुम्बराणि स्म दातुं तेषां प्रचक्रिरे ।। ३५ ।।
तब राजाकी प्रेरणासे उनके मन्त्री वनमें गये और गूलरके फल तोड़कर उन्हें देनेकी चेष्टा करने लगे ।। ३५ ।।
उदुम्बराण्यर्थान्यानि हेमगर्भाण्युपाहरन् ।
भृत्यास्तेषां ततस्तानि प्रग्राहितुमुपाद्रवन् ।। ३६ ।।
मन्त्रियोंने गूलर तथा दूसरे-दूसरे वृक्षोंके फल तोड़कर उनमें सुवर्ण-मुद्राएँ भर दीं। फिर उन फलोंको लेकर राजाके सेवक उन्हें ऋषियोंके हवाले करनेके लिये उनके पीछे दौड़े गये ।। ३६ ।।
गुरूणीति विदित्वाथ न ग्राह्याण्यत्रिरब्रवीत् ।
न स्महे मन्दविज्ञाना न स्महे मन्दबुद्धयः ।। ३७ ।।
हैमानीमानि जानीमः प्रतिबुद्धाः स्म जागृम ।
इह ह्येतदुपादत्तं प्रेत्य स्यात् कटुकोदयम् ।
अप्रतिग्राह्यमेवैतत् प्रेत्येह च सुखेप्सुना ।। ३८ ।।
वे सभी फल भारी हो गये थे, इस बातको महर्षि अत्रि ताड़ गये और बोले—ये 'गूलर हमारे लेने योग्य नहीं हैं। हमारी बुद्धि मन्द नहीं हुई है। हमारी ज्ञानशक्ति लुप्त नहीं हुई है। हम सो नहीं रहे हैं, जागते हैं। हमें अच्छी तरह ज्ञात है कि इनके भीतर सुवर्ण भरा पड़ा है।