महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 828, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरूँगा॥ ५ ॥ जमदग्नेश्च संवादं सूर्यस्य च महात्मनः। पुरा स भगवान् साक्षाद्धनुषाक्रीडयत् प्रभो॥ ६ ॥ संधाय संधाय शरांश्चिक्षेप किल भार्गवः। तान् क्षिप्तान् रेणुका सर्वांस्तस्येषून्दीप्ततेजसः॥ ७ ॥ आनीय सा तदा तस्मै प्रादादसकृदच्युत। प्रभो! इस विषयमें महर्षि जमदग्नि और महात्मा भगवान् सूर्यके संवादका वर्णन किया जाता है। पूर्वकालकी बात है, एक दिन भृगुनन्दन भगवान् जमदग्निजी धनुष चलानेकी क्रीड़ा कर रहे थे। धर्मसे च्युत न होनेवाले युधिष्ठिर! वे बारंबार धनुषपर बाण रखकर उन्हें चलाते और उन चलाये हुए सम्पूर्ण तेजस्वी बाणोंको उनकी पत्नी रेणुका ला-लाकर दिया करती थीं॥ ६-७ १/२ ॥
अथ तेन स शब्देन ज्यायाश्चैव शरस्य च॥ ८ ॥ प्रहृष्टः सम्प्रचिक्षेप सा च प्रत्याजहार तान्। धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि और बाणके छूटनेकी सनसनाहटसे जमदग्नि मुनि बहुत प्रसन्न होते थे। अतः वे बार-बार बाण चलाते और रेणुका उन्हें दूरसे उठा-उठाकर लाया करती थीं॥ ८ १/२ ॥
ततो मध्याह्नमारूढे ज्येष्ठामूले दिवाकरे॥ ९ ॥ स सायकान् द्विजो मुक्त्वा रेणुकामिदमब्रवीत्। गच्छानय विशालाक्षि शरानेतान् धनुश्च्युतान्॥ १० ॥ यावदेतान् पुनः सुभ्रु क्षिपामीति जनाधिप। जनेश्वर! इस प्रकार बाण चलानेकी क्रीड़ा करते-करते ज्येष्ठ मासके सूर्य दिनके मध्यभागमें आ पहुँचे। विप्रवर जमदग्निने पुनः बाण छोड़कर रेणुकासे कहा—'सुभ्रु! विशाललोचने! जाओ, मेरे धनुषसे छूटे हुए इन बाणोंको ले आओ, जिससे मैं पुनः इन सबको धनुषपर रखकर छोड़ूँ'॥ ९-१० १/२ ॥
सा गच्छन्त्यन्तरा छायां वृक्षमाश्रित्य भामिनी॥ ११ ॥ तस्थौ तस्या हि सन्तप्तं शिरः पादौ तथैव च। मानिनी रेणुका वृक्षोंके बीचसे होकर उनकी छायाका आश्रय ले जाती हुई बीच-बीचमें ठहर जाती थी; क्योंकि उसके सिर और पैर तप गये थे॥ ११ १/२ ॥
स्थिता सा तु मुहूर्तं वै भर्तुः शापभयाच्छुभा॥ १२ ॥ ययावानयितुं भूयः सायकानसितेक्षणा। कजरारे नेत्रोंवाली वह कल्याणमयी देवी एक जगह दो ही घड़ी ठहरकर पतिके शापके भयसे पुनः उन बाणोंको लानेके लिये चल दी॥ १२ १/२ ॥