महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 83, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽध्यायः
दैवकी अपेक्षा पुरुषार्थकी श्रेष्ठताका वर्णन
युधिष्ठिर उवाच
पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद ।
दैवे पुरुषकारे च किंस्वित् श्रेष्ठतरं भवेत् ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने पूछा—**सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ महाप्राज्ञ पितामह! दैव और पुरुषार्थमें कौन श्रेष्ठ है? ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
वसिष्ठस्य च संवादं ब्रह्मणश्च युधिष्ठिर ॥ २ ॥
**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! इस विषयमें वसिष्ठ और ब्रह्माजीके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
दैवमानुष्ययोः किंस्वित् कर्मणोः श्रेष्ठमित्युत ।
पुरा वसिष्ठो भगवान् पितामहमपृच्छत ॥ ३ ॥
प्राचीन कालकी बात है, भगवान् वसिष्ठने लोकपितामह ब्रह्माजीसे पूछा—'प्रभो! दैव और पुरुषार्थमें कौन श्रेष्ठ है?' ॥ ३ ॥
ततः पद्मोद्भवो राजन् देवदेवः पितामहः ।
उवाच मधुरं वाक्यमर्थवद्धेतुभूषितम् ॥ ४ ॥
राजन्! तब कमलजन्मा देवाधिदेव पितामहने मधुर स्वरमें युक्तियुक्त सार्थक वचन कहा— ॥ ४ ॥
ब्रह्मोवाच
(बीजतो ह्यङ्कुरोत्पत्तिरङ्कुरात् पर्णसम्भवः ।
पर्णानालाः प्रसूयन्ते नालात् स्कन्धः प्रवर्तते ॥
स्कन्धात् प्रवर्तते पुष्पं पुष्पान्निर्वर्तते फलम् ।
फलान्निर्वर्त्यते बीजं बीजं नाफलमुच्यते ॥)
**ब्रह्माजीने कहा—**मुने! बीजसे अंकुरकी उत्पत्ति होती है, अंकुरसे पत्ते होते हैं। पत्तोंसे नाल, नालसे तने और डालियाँ होती हैं। उनसे पुष्प प्रकट होता है। फूलसे फल लगता है और फलसे बीज उत्पन्न होता है और बीज कभी निष्फल नहीं बताया गया है ॥
नाबीजं जायते किंचिन्न बीजेन बिना फलम् ।
बीजाद् बीजं प्रभवति बीजादेव फलं स्मृतम् ॥ ५ ॥