भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 835, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 835

सोऽपि लोकानवाप्नोति दैवतैरभिपूजितान् ।
गोलोके स मुदा युक्तो वसति प्रेत्य भारत ॥ २१ ॥
महाबाहो! भरतनन्दन! जिसके पैर जल रहे हों ऐसे कठोर व्रतधारी स्नातक द्विजको जो जूते दान करता है, वह शरीर-त्यागके पश्चात् देववन्दित लोकोंमें जाता है और बड़ी प्रसन्नताके साथ गोलोकमें निवास करता है ॥

एतत् ते भरतश्रेष्ठ मया कार्त्स्न्येन कीर्तितम् ।
छत्रोपानहदानस्य फलं भरतसत्तम ॥ २२ ॥
भरतश्रेष्ठ! भरतसत्तम! यह मैंने तुमसे छातों और जूतोंके दानका सम्पूर्ण फल बताया है ॥ २२ ॥

[सेवासे शूद्रोंकी परम गति, शौचाचार, सदाचार तथा वर्णधर्मका कथन एवं संन्यासियोंके धर्मोंका वर्णन और उससे उनको परम गतिकी प्राप्ति]

युधिष्ठिर उवाच

शूद्राणामिह शुश्रूषा नित्यमेवानुवर्णिता ।
कैः कारणैः कतिविधा शुश्रूषा समुदाहृता ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! इस जगत्‌में शूद्रोंके लिये सदा द्विजातियोंकी सेवाको ही परम धर्म बताया गया है। वह सेवा किन कारणोंसे कितने प्रकारकी कही गयी है? ॥

के च शुश्रूषया लोका विहिता भरतर्षभ ।
शूद्राणां भरतश्रेष्ठ ब्रूहि मे धर्मलक्षणम् ॥
भरतभूषण! भरतरत्न! शूद्रोंको द्विजोंकी सेवासे किन लोकोंकी प्राप्ति बतायी गयी है? मुझे धर्मका लक्षण बताइये ॥

भीष्म उवाच

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
शूद्राणामनुकम्पार्थं यदुक्तं ब्रह्मवादिना ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें ब्रह्मवादी पराशरने शूद्रोंपर कृपा करनेके लिये जो कुछ कहा है, उसी इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥

वृद्धः पराशरः प्राह धर्मं शुभ्रमनामयम् ।
अनुग्रहार्थं वर्णानां शौचाचारसमन्वितम् ॥
बड़े-बूढ़े पराशर मुनिने सब वर्णोंपर कृपा करनेके लिये शौचाचारसे सम्पन्न निर्मल एवं अनामय धर्मका प्रतिपादन किया ॥

धर्मोपदेशमखिलं यथावदनुपूर्वशः ।
शिष्यानध्यापयामास शास्त्रमर्थवदर्थवित् ॥