भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 837, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 837

ततो म्लेच्छा भवन्त्येते निर्गुणा धर्मवर्जिताः ।। पुनश्च निरयं तेषां तिर्यग्योनिश्च शाश्वती । नरकसे निकलनेपर ये धर्मरहित निर्दय मनुष्य म्लेच्छ होते हैं और म्लेच्छ होनेके बाद फिर पापकर्म करनेसे उन्हें सदाके लिये नरक और पशु-पक्षी आदि तिर्यक् योनिकी प्राप्ति होती है ।।

ये तु सत्पथमास्थाय वर्णाश्रमकृतं पुरा ।। सर्वान् विमार्गानुत्सृज्य स्वधर्मपथमाश्रिताः । सर्वभूतदयावन्तो दैवतद्विजपूजकाः ।। शास्त्रदृष्टेन विधिना श्रद्धया जितमन्यवः । तेषां विधिं प्रवक्ष्यामि यथावदनुपूर्वशः ।। उपादानविधिं कृत्स्नं शुश्रूषाधिगमं तथा । जो लोग प्राचीन वर्णाश्रमोचित सन्मार्गका आश्रय ले सारे विपरीत मार्गोंका परित्याग करके स्वधर्मके मार्गपर चलते हैं, समस्त प्राणियोंके प्रति दया रखते हैं और क्रोधको जीतकर शास्त्रोक्त विधिसे श्रद्धापूर्वक देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी पूजा करते हैं, उनके लिये यथावत् रूपसे क्रमशः सम्पूर्ण धर्मोंके ग्रहणकी विधि तथा सेवाभावकी प्राप्ति आदिका वर्णन करता हूँ ।।

शौचकृत्यस्य शौचार्थान् सर्वानैव विशेषतः ।। महाशौचप्रभृतयो दृष्टास्तत्त्वार्थदर्शिभिः । जो विशेषरूपसे शौचका सम्पादन करना चाहते हैं, उनके लिये सभी शौचविषयक प्रयोजनोंका वर्णन करता हूँ। तत्त्वदर्शी विद्वानोंने शास्त्रमें महाशौच आदि विधानोंको प्रत्यक्ष देखा है ।।

तत्रापि शूद्रो भिक्षूणां मृदं शेषं च कल्पयेत् ।। वहाँ शूद्र भी भिक्षुओंके शौचाचारके लिये मिट्टी तथा अन्य आवश्यक पदार्थोंका प्रबन्ध करे ।।

भिक्षुभिः सुकृतप्रज्ञैः केवलं धर्ममाश्रितैः । सम्यग्दर्शनसम्पन्नैर्गताध्वनि हितार्थिभिः ।। अवकाशमिदं मेध्यं निर्मितं कामवीरुधम् । जो धर्मके ज्ञाता, केवल धर्मके ही आश्रित तथा सम्यक् ज्ञानसे सम्पन्न हैं, उन सर्वहितैषी संन्यासियोंको चाहिये कि वे सज्जनाचरित मार्गपर स्थित हो इस पवित्र कामलतास्वरूप स्थान (मलत्यागके योग्य क्षेत्र आदि) का निश्चय करे ।।

निर्जनं संवृतं बुद्ध्वा नियतात्मा जितेन्द्रियः ।। सजलं भाजनं स्थाप्यं मृत्तिकां च परीक्षिताम् । परीक्ष्य भूमिं मूत्रार्थी तत आसीत वाग्यतः ।।