महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंइस जगत्में पुरुषार्थ करनेसे स्वर्ग, भोग, धर्ममें निष्ठा और बुद्धिमत्ता—इन सबकी उपलब्धि होती है ॥ १३ ॥ ज्योतींषि त्रिदशा नागा यक्षाश्चन्द्रार्कमरुतः । सर्व पुरुषकारेण मानुष्याद् देवतां गताः ॥ १४ ॥ नक्षत्र, देवता, नाग, यक्ष, चन्द्रमा, सूर्य और वायु आदि सभी पुरुषार्थ करके ही मनुष्यलोकसे देवलोकको गये हैं ॥ १४ ॥ अर्थो वा मित्रवर्गो वा ऐश्वर्यं वा कुलान्वितम् । श्रीश्चापि दुर्लभा भोक्तुं तथैवाकृतकर्मभिः ॥ १५ ॥ जो पुरुषार्थ नहीं करते वे धन, मित्रवर्ग, ऐश्वर्य, उत्तम कुल तथा दुर्लभ लक्ष्मीका भी उपभोग नहीं कर सकते ॥ १५ ॥ शौचेन लभते विप्रः क्षत्रियो विक्रमेण तु । वैश्यः पुरुषकारेण शूद्रः शुश्रूषया श्रियम् ॥ १६ ॥ ब्राह्मण शौचाचारसे, क्षत्रिय पराक्रमसे, वैश्य उद्योगसे तथा शूद्र तीनों वर्णोंकी सेवासे सम्पत्ति पाता है ॥ १६ ॥ नादातारं भजन्त्यर्था न क्लीबं नापि निष्क्रियम् । नाकर्मशीलं नाशूरं तथा नैवातपस्विनम् ॥ १७ ॥ न तो दान न देनेवाले कंजूसको धन मिलता है, न नपुंसकको, न अकर्मण्यको, न कामसे जी चुरानेवालेको, न शौर्यहीनको और न तपस्या न करनेवालेको ही मिलता है ॥ १७ ॥ येन लोकास्त्रयः सृष्टा दैत्याः सर्वाश्च देवताः । स एष भगवान् विष्णुः समुद्रे तप्यते तपः ॥ १८ ॥ जिन्होंने तीनों लोकों, दैत्यों तथा सम्पूर्ण देवताओंकी भी सृष्टि की है, वे ही ये भगवान् विष्णु समुद्रमें रहकर तपस्या करते हैं ॥ १८ ॥ स्वं चेत् कर्मफलं न स्यात् सर्वमेवाफलं भवेत् । लोको दैवं समालक्ष्य उदासीनो भवेन्ननु ॥ १९ ॥ यदि अपने कर्मोंका फल न प्राप्त हो तो सारा कर्म ही निष्फल हो जाय और सब लोग भाग्यको ही देखते हुए कर्म करनेसे उदासीन हो जायँ ॥ १९ ॥ अकृत्वा मानुषं कर्म यो दैवमनुवर्तते । वृथा श्राम्यति सम्प्राप्य पतिं क्लीबमिवाङ्गना ॥ २० ॥ मनुष्यके योग्य कर्म न करके जो पुरुष केवल दैवका अनुसरण करता है वह दैवका आश्रय लेकर व्यर्थ ही कष्ट उठाता है। जैसे कोई स्त्री अपने नपुंसक पतिको पाकर भी कष्ट ही भोगती है ॥ २० ॥ न तथा मानुषे लोके भयमस्ति शुभाशुभे ।