महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 861, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथैव विश्वेदेवेभ्यो बलिमाकाशतो हरेत् । निशाचरेभ्यो भूतेभ्यो बलिं नक्तं तथा हरेत् ॥ १४ ॥ विश्वेदेवोंके लिये आकाशमें बलि अर्पित करे। निशाचरों और भूतोंके लिये रातमें बलि दे ॥ १४ ॥ एवं कृत्वा बलिं सम्यग् दद्याद् भिक्षां द्विजाय वै । अलाभे ब्राह्मणस्याग्नावग्रमुद्धृत्य निक्षिपेत् ॥ १५ ॥ इस प्रकार बलि समर्पण करके ब्राह्मणको विधिपूर्वक भिक्षा दे। यदि ब्राह्मण न मिले तो अन्नमेंसे थोड़ा-सा अग्रग्रास निकालकर उसका अग्निमें होम कर दे ॥ यदा श्राद्धं पितृभ्योऽपि दातुमिच्छेत मानवः । तदा पश्चात् प्रकुर्वीत निवृत्ते श्राद्धकर्मणि ॥ १६ ॥ पितॄन् संतर्पयित्वा तु बलिं कुर्याद् विधानतः । वैश्वदेवं ततः कुर्यात् पश्चाद् ब्राह्मणवाचनम् ॥ १७ ॥ जिस दिन पितरोंका श्राद्ध करनेकी इच्छा हो, उस दिन पहले श्राद्धकी क्रिया पूरी करे। उसके बाद पितरोंका तर्पण करके विधिपूर्वक बलिवैश्वदेव-कर्म करे। तदनन्तर ब्राह्मणोंको सत्कारपूर्वक भोजन करावे ॥ ततोऽन्नेन विशेषेण भोजयेदतिथीनपि । अर्चापूर्वं महाराज ततः प्रीणाति मानवान् ॥ १८ ॥ महाराज! इसके बाद विशेष अन्नके द्वारा अतिथियोंको भी सम्मानपूर्वक भोजन करावे। ऐसा करनेसे गृहस्थ पुरुष सम्पूर्ण मनुष्योंको संतुष्ट करता है ॥