भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 87

सुकृतं दुष्कृतं कर्म न यथार्थं प्रपद्यते ॥ २८ ॥ प्रबल पुरुषार्थ करनेसे पहलेका किया हुआ भी कोई कर्म बिना किया हुआ-सा हो जाता है और वह प्रबल कर्म ही सिद्ध होकर फल प्रदान करता है। इस तरह पुण्य या पापकर्म अपने यथार्थ फलको नहीं दे पाते हैं ॥ २८ ॥

देवानां शरणं पुण्यं सर्वं पुण्यैरवाप्यते । पुण्यशीलं नरं प्राप्य किं दैवं प्रकरिष्यति ॥ २९ ॥ देवताओंका आश्रय पुण्य ही है। पुण्यसे ही सब कुछ प्राप्त होता है। पुण्यात्मा पुरुषको पाकर दैव क्या करेगा? ॥ २९ ॥

पुरा ययातिर्विभ्रष्टश्च्यावितः पतितः क्षितौ । पुनरारोपितः स्वर्गं दौहित्रैः पुण्यकर्मभिः ॥ ३० ॥ पूर्वकालमें राजा ययाति पुण्य क्षीण होनेपर स्वर्गसे च्युत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े थे; परंतु उनके पुण्यकर्मा दौहित्रोंने उन्हें पुनः स्वर्गलोकमें पहुँचा दिया ॥ ३० ॥

पुरूरवाश्च राजर्षिर्द्विजैरभिहितः पुरा । ऐल इत्यभिविख्यातः स्वर्गं प्राप्तो महीपतिः ॥ ३१ ॥ इसी तरह पूर्वकालमें ऐल नामसे विख्यात राजर्षि पुरूरवा ब्राह्मणोंके आशीर्वाद देनेपर स्वर्गलोकको प्राप्त हुए थे ॥ ३१ ॥

अश्वमेधादिभिर्यज्ञैः सत्कृतः कोसलाधिपः । महर्षिशापात् सौदासः पुरुषादत्वमागतः ॥ ३२ ॥ (अब इसके विपरीत दृष्टान्त देते हैं—) अश्वमेध आदि यज्ञोंद्वारा सम्मानित होनेपर भी कोशलनरेश सौदासको महर्षि वसिष्ठके शापसे नरभक्षी राक्षस होना पड़ा ॥ ३२ ॥

अश्वत्थामा च रामश्च मुनिपुत्रौ धनुर्धरौ । न गच्छतः स्वर्गलोकं सुकृतेनेह कर्मणा ॥ ३३ ॥ इसी प्रकार अश्वत्थामा और परशुराम—ये दोनों ही ऋषिपुत्र और धनुर्धर वीर हैं। इन दोनोंने पुण्यकर्म भी किये हैं तथापि उस कर्मके प्रभावसे स्वर्गमें नहीं गये ॥ ३३ ॥

वसुर्यज्ञशतैरिष्ट्वा द्वितीय इव वासवः । मिथ्याभिधानेनैकेन रसातलतलं गतः ॥ ३४ ॥ द्वितीय इन्द्रके समान सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके भी राजा वसु एक ही मिथ्या भाषणके दोषसे रसातलको चले गये ॥ ३४ ॥

बलिवैरोचनिर्बद्धो धर्मपाशेन दैवतैः । विष्णोः पुरुषकारेण पातालसदनः कृतः ॥ ३५ ॥ विरोचनकुमार बलिको देवताओंने धर्मपाशसे बाँध लिया और भगवान् विष्णुके पुरुषार्थसे वे पातालवासी बना दिये गये ॥ ३५ ॥

शक्रस्योद्गम्य चरणं प्रस्थितो जनमेजयः ।