महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 894, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ें**धृतराष्ट्र बोले—**जो सदा अतिथियोंकी सेवामें तत्पर रहकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाले हैं, जो लोग ब्राह्मणको आश्रयदान करते हैं, तथा जो अपने आश्रितोंको बाँटकर शेष अन्नका भोजन करते हैं, वे ही लोग उस मंदाकिनीतटकी शोभा बढ़ाते हैं (राजा धृतराष्ट्रको तो वहाँ भी नहीं जाना है) ॥ १९ ॥
गौतम उवाच
मेरोरग्रे यद् वनं भाति रम्यं
सुपुष्पितं किन्नरीगीतजुष्टम् ।
सुदर्शना यत्र जम्बूविशाला
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २० ॥
**गौतम बोले—**मेरुपर्वतके सामने जो रमणीय वन शोभा पाता है, जहाँ सुंदर फूलोंकी छटा छायी रहती है और किन्नरियोंके मधुर गीत गूँजते रहते है, जहाँ देखनेमें सुंदर विशाल जम्बूवृक्ष शोभा पाता है, वहाँ पहुँचकर भी मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ २० ॥
धृतराष्ट्र उवाच
ये ब्राह्मणा मृदवः सत्यशीला
बहुश्रुताः सर्वभूताभिरामाः ।
येऽधीयते सेतिहासं पुराणं
मध्वाहृत्या जुह्वति वै द्विजेभ्यः ॥ २१ ॥
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ।
यद् विद्यते विदितं स्थानमस्ति
तद् ब्रूहि त्वं त्वरितो ह्येष यामि ॥ २२ ॥
**धृतराष्ट्र बोले—**महर्षे! जो ब्राह्मण कोमलस्वभाव, सत्यशील, अनेक शास्त्रोंके विद्वान् तथा सम्पूर्ण भूतोंको प्यार करनेवाले हैं, जो इतिहास और पुराणका अध्ययन करते तथा ब्राह्मणोंको मधुर भोजन अर्पित करते हैं; ऐसे लोगोंके लिये ही यह पूर्वोक्त लोक है; परंतु राजा धृतराष्ट्र वहाँ भी जानेवाला नहीं है। आपको जो-जो स्थान विदित हैं, उन सबका यहाँ वर्णन कर जाइये। मैं जानेके लिये उतावला हूँ। यह देखिये, मैं चला ॥
गौतम उवाच
सुपुष्पितं किन्नरराजजुष्टं
प्रियं वनं नंदनं नारदस्य ।
गंधर्वाणामप्सरसां च शश्वत्
तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २३ ॥