भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 896, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 896

लाभालाभे तुल्यनिन्दाप्रशंसाः ।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ २८ ॥

धृतराष्ट्रने कहा— महर्षे! जो समस्त प्राणियोंमें निष्काम हैं, जो मांसाहार नहीं करते, किसी भी प्राणीको दण्ड नहीं देते, स्थावर-जंगम प्राणियोंकी हिंसा नहीं करते, जिनके लिये समस्त प्राणी अपने आत्माके ही तुल्य हैं, जो कामना, ममता और आसक्तिसे रहित हैं, लाभ-हानि, निंदा तथा प्रशंसामें जो सदा समभाव रखते हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह उत्तर कुरुनामक लोक है; परंतु धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है ॥ २७-२८ ॥

गौतम उवाच

ततोऽपरे भान्ति लोकाः सनातनाः
सुपुण्यगन्धा विरजा वीतशोकाः ।
सोमस्य राज्ञः सदने महात्मन-
स्तत्र त्वाहं हस्तिनं यातयिष्ये ॥ २९ ॥

गौतमने कहा— राजन्! उससे भिन्न बहुत-से सनातन लोक हैं, जहाँ पवित्र गंध छायी रहती है। वहाँ रजोगुण तथा शोकका सर्वथा अभाव है। महात्मा राजा सोमके लोकमें उनकी स्थिति है। वहाँ पहुँचकर मैं तुमसे अपना हाथी वापस लूँगा ॥ २९ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

ये दानशीला न प्रतिगृह्णते सदा
न चाप्यर्थांश्चाददते परेभ्यः ।
येषामदेयमर्हते नास्ति किंचित्
सर्वातिथ्याः सुप्रसादा जनाश्च ॥ ३० ॥
ये क्षन्तारो नाभिजल्पन्ति चान्यान्
सत्रीभूताः सततं पुण्यशीलाः ।
तथाविधानामेष लोको महर्षे
परं गन्ता धृतराष्ट्रो न तत्र ॥ ३१ ॥

धृतराष्ट्रने कहा— महर्षे! जो सदा दान करते हैं, किंतु दान लेते नहीं, जिनकी दृष्टिमें सुयोग्य पात्रके लिये कुछ भी अदेय नहीं है, जो सबका अतिथि-सत्कार करते तथा सबके प्रति कृपाभाव रखते हैं, जो क्षमाशील हैं, दूसरोंसे कभी कुछ नहीं बोलते हैं और जो पुण्यशील महात्मा सदा सबके लिये अन्नसत्ररूप हैं, ऐसे लोगोंके लिये ही यह सोमलोक है; परंतु धृतराष्ट्रको वहाँ भी नहीं जाना है ॥ ३०-३१ ॥

गौतम उवाच

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