भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 921, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 921

आर्द्रपादस्तु भुंजानो वर्षाणां जीवते शतम् । त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट आलभेत कदाचन ॥ ६२ ॥ अग्निं गां ब्राह्मणं चैव तथा ह्यायुर्न रिष्यते । भीगे पैर भोजन करनेवाला मनुष्य सौ वर्षोंतक जीवन धारण करता है। भोजन करके हाथ-मुँह धोये बिना मनुष्य उच्छिष्ट (अपवित्र) रहता है। ऐसी अवस्थामें उसे अग्नि, गौ तथा ब्राह्मण—इन तीन तेजस्वियोंका स्पर्श नहीं करना चाहिये। इस प्रकार आचरण करनेसे आयुका नाश नहीं होता ॥ ६२ १/२ ॥

त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट उदीक्षेत कदाचन ॥ ६३ ॥ सूर्याचन्द्रमसौ चैव नक्षत्राणि च सर्वशः । उच्छिष्ट मनुष्यको सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्र—इन त्रिविध तेजोंकी ओर कभी दृष्टि नहीं डालनी चाहिये ॥ ६३ १/२ ॥

ऊर्ध्वं प्राणा ह्युत्क्रामन्ति यूनः स्थविर आयति ॥ ६४ ॥ प्रत्युत्थानाभिवादाभ्यां पुनस्तान् प्रतिपद्यते । वृद्ध पुरुषके आनेपर तरुण पुरुषके प्राण ऊपरकी ओर उठने लगते हैं। ऐसी दशामें जब वह खड़ा होकर वृद्ध पुरुषोंका स्वागत और उन्हें प्रणाम करता है, तब वे प्राण पुनः पूर्वावस्थामें आ जाते हैं ॥ ६४ १/२ ॥

अभिवादयीत वृद्धांश्च दद्याच्चैवासनं स्वयम् ॥ ६५ ॥ कृतांजलिरुपासीत गच्छन्तं पृष्ठतोऽन्वियात् । इसलिये जब कोई वृद्ध पुरुष अपने पास आवे, तब उसे प्रणाम करके बैठनेको आसन दे और स्वयं हाथ जोड़कर उसकी सेवामें उपस्थित रहे। फिर जब वह जाने लगे, तब उसके पीछे-पीछे कुछ दूरतक जाय ॥

न चासीतासने भिन्ने भिन्नकांस्यं च वर्जयेत् ॥ ६६ ॥ नैकवस्त्रेण भोक्तव्यं न नग्नः स्नातुमर्हति । फटे हुए आसनपर न बैठे। फूटी हुई काँसीकी थालीको काममें न ले। एक ही वस्त्र (केवल धोती) पहनकर भोजन न करे (साथमें गमछा भी लिये रहे)। नग्न होकर स्नान न करे ॥ ६६ १/२ ॥

स्वप्तव्यं नैव नग्नेन न चोच्छिष्टोऽपि संविशेत् ॥ ६७ ॥ उच्छिष्टो न स्पृशेच्छीर्षं सर्वे प्राणास्तदाश्रयाः । नंगे होकर न सोये। उच्छिष्ट अवस्थामें भी शयन न करे। जूठे हाथसे मस्तकका स्पर्श न करे; क्योंकि समस्त प्राण मस्तकके ही आश्रित हैं ॥ ६७ १/२ ॥

केशग्रहं प्रहारांश्च शिरस्येतान् विवर्जयेत् ॥ ६८ ॥ न संहताभ्यां पाणिभ्यां कण्डूयेदात्मनः शिरः ।

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