भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 923, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 923

त्रीन् कृशान् नावजानीयाद् दीर्घमायुर्जिजीविषुः । ब्राह्मणं क्षत्रियं सर्पं सर्वे ह्याशीविषास्त्रयः ॥ ७७ ॥ जिसे दीर्घ कालतक जीवित रहनेकी इच्छा हो, वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और सर्प—इन तीनोंके दुर्बल होनेपर भी इनको न छेड़े; क्योंकि ये सभी बड़े जहरीले होते हैं ॥

दहत्याशीविषः क्रुद्धो यावत् पश्यति चक्षुषा । क्षत्रियोऽपि दहेत् क्रुद्धो यावत् स्पृशति तेजसा ॥ ७८ ॥ ब्राह्मणस्तु कुलं हन्याद् ध्यानेनावेक्षितेन च । तस्मादेतत् त्रयं यत्नादुपसेवेत पण्डितः ॥ ७९ ॥ क्रोधमें भरा हुआ साँप जहाँतक आँखोंसे देख पाता है, वहाँतक धावा करके काटता है। क्षत्रिय भी कुपित होनेपर अपनी शक्तिभर शत्रुको भस्म करनेकी चेष्टा करता है; परंतु ब्राह्मण जब कुपित होता है, तब वह अपनी दृष्टि और संकल्पसे अपमान करनेवाले पुरुषके सम्पूर्ण कुलको दग्ध कर डालता है; इसलिये समझदार मनुष्यको यत्नपूर्वक इन तीनोंकी सेवा करनी चाहिये ॥ ७८-७९ ॥

गुरुणा चैव निर्बन्धो न कर्तव्यः कदाचन । अनुमान्यः प्रसाद्यश्च गुरुः क्रुद्धो युधिष्ठिर ॥ ८० ॥ गुरुके साथ कभी हठ नहीं ठानना चाहिये। युधिष्ठिर! यदि गुरु अप्रसन्न हों तो उन्हें हर तरहसे मान देकर मनाकर प्रसन्न करनेकी चेष्टा करनी चाहिये ॥

सम्यङ्मिथ्याप्रवृत्तेऽपि वर्तितव्यं गुराविह । गुरुनिन्दा दहत्यायुर्मुष्याणां न संशयः ॥ ८१ ॥ गुरु प्रतिकूल बर्ताव करते हों तो भी उनके प्रति अच्छा ही बर्ताव करना उचित है; क्योंकि गुरुनिन्दा मनुष्योंकी आयुको दग्ध कर देती है, इसमें संशय नहीं है ॥ ८१ ॥

दूरादावसथान्मूत्रं दूरात् पादावसेचनम् । उच्छिष्टोत्सर्जनं चैव दूरे कार्यं हितैषिणा ॥ ८२ ॥ अपना हित चाहनेवाला मनुष्य घरसे दूर जाकर पेशाब करे, दूर ही पैर धोवे और दूरपर ही जूठे फेंके ॥ ८२ ॥

रक्तमाल्यं न धार्यं स्याच्छुक्लं धार्यं तु पण्डितैः । वर्जयित्वा तु कमलं तथा कुवलयं प्रभो ॥ ८३ ॥ प्रभो! विद्वान् पुरुषको लाल फूलोंकी नहीं, श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करनी चाहिये; परंतु कमल और कुवलयको छोड़कर ही यह नियम लागू होता है। अर्थात् कमल और कुवलय लाल हों तो भी उन्हें धारण करनेमें कोई हर्ज नहीं है ॥ ८३ ॥

रक्तं शिरसि धार्यं तु तथा वानेयमित्यपि । कांचनीयापि माला या न सा दुष्यति कर्हिचित् ॥ ८४ ॥