महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 925, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंपिप्पलं च वटं चैव शणशाकं तथैव च ।
उदुम्बरं न खादेच्च भवार्थी पुरुषोत्तमः ॥ ९२ ॥
अपना कल्याण चाहनेवाले श्रेष्ठ पुरुषको पीपल, बड़ और गूलरके फलका तथा सनके सागका सेवन नहीं करना चाहिये ॥ ९२ ॥
न पाणौ लवणं विद्वान् प्राश्नीयान्न च रात्रिषु ।
दधिसक्तून् न भुञ्जीत वृथा मांसं च वर्जयेत् ॥ ९३ ॥
विद्वान् पुरुष हाथमें नमक लेकर न चाटे। रातमें दही और सत्तू न खाय। मांस अखाद्य वस्तु है, उसका सर्वथा त्याग कर दे ॥ ९३ ॥
सायंप्रातश्च भुञ्जीत नान्तराले समाहितः ।
वालेन तु न भुञ्जीत परश्राद्धं तथैव च ॥ ९४ ॥
प्रतिदिन सबेरे और शामको ही एकाग्रचित्त होकर भोजन करे। बीचमें कुछ भी खाना उचित नहीं है। जिस भोजनमें बाल पड़ गया हो, उसे न खाय तथा शत्रुके श्राद्धमें कभी अन्न न ग्रहण करे ॥ ९४ ॥
वाग्यतो नैकवस्त्रश्च नासंविष्टः कदाचन ।
भूमौ सदैव नाश्नीयान्नानासीनो न शब्दवत् ॥ ९५ ॥
भोजनके समय मौन रहना चाहिये। एक ही वस्त्र धारण करके अथवा सोये-सोये कदापि भोजन न करे। भोजनके पदार्थको भूमिपर रखकर कदापि न खाय। खड़ा होकर या बातचीत करते हुए कभी भोजन नहीं करना चाहिये ॥ ९५ ॥
तोयपूर्वं प्रदायान्नमतिथिभ्यो विशाम्पते ।
पश्चाद् भुञ्जीत मेधावी न चाप्यन्यमना नरः ॥ ९६ ॥
प्रजानाथ! बुद्धिमान् पुरुष पहले अतिथिको अन्न और जल देकर पीछे स्वयं एकाग्रचित्त हो भोजन करे ॥
समानमेकपङ्क्त्यां तु भोज्यमन्नं नरेश्वर ।
विषं हालाहलं भुङ्क्ते योऽप्रदाय सुहृज्जने ॥ ९७ ॥
नरेश्वर! एक पंक्तिमें बैठनेपर सबको एक समान भोजन करना चाहिये। जो अपने सुहृद्जनोंको न देकर अकेला ही भोजन करता है, वह हालाहल विष ही खाता है ॥ ९७ ॥
पानीयं पायसं सक्तून् दधिसर्पिर्मधून्यपि ।
निरस्य शेषमन्येषां न प्रदेयं तु कस्यचित् ॥ ९८ ॥
पानी, खीर, सत्तू, दही, घी और मधु—इन सबको छोड़कर अन्य भक्ष्य पदार्थोंका अवशिष्ट भाग दूसरे किसीको नहीं देना चाहिये ॥ ९८ ॥
भुञ्जानो मनुजव्याघ्र नैव शंकां समाचरेत् ।
दधि चाप्यनुपानं वै न कर्तव्यं भवार्थिना ॥ ९९ ॥