भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 93, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 93

जो वीरासन रणभूमिमें जाकर वीरशय्या (मृत्यु)-को प्राप्त हो वीरस्थान (स्वर्गलोक) में जाता है, उसे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होती है। वे लोक सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं ॥ १३ ॥

धनं लभेत दानेन मौनेनाज्ञां विशाम्पते । उपभोगांश्च तपसा ब्रह्मचर्येण जीवितम् ॥ १४ ॥ प्रजानाथ! मनुष्य दानसे धन पाता है, मौन-व्रतके पालनसे दूसरोंद्वारा आज्ञापालन करानेकी शक्ति प्राप्त करता है, तपस्यासे भोग और ब्रह्मचर्य-पालनसे जीवन (आयु)-की उपलब्धि होती है ॥ १४ ॥

रूपमैश्वर्यमारोग्यमहिंसाफलमश्नुते । फलमूलाशनो राज्यं स्वर्गः पर्णाशिनां भवेत् ॥ १५ ॥ अहिंसा धर्मके आचरणसे रूप, ऐश्वर्य और आरोग्यरूपी फलकी प्राप्ति होती है। फल-मूल खानेवालेको राज्य और पत्ते चबाकर रहनेवालेको स्वर्गकी प्राप्ति होती है ॥ १५ ॥

प्रायोपवेशिनो राजन् सर्वत्र सुखमुच्यते । गवाढ्यः शाकदीक्षायां स्वर्गगामी तृणाशनः ॥ १६ ॥ राजन्! जो आमरण अनशनका व्रत लेकर बैठता है उसके लिये सर्वत्र सुख बताया गया है। शाकाहारकी दीक्षा लेनेपर गोधनकी प्राप्ति होती है और तृण खाकर रहनेवाला पुरुष स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १६ ॥

स्त्रियस्त्रिषवणं स्नात्वा वायुं पीत्वा क्रतुं लभेत् । स्वर्गं सत्येन लभते दीक्षया कुलमुत्तमम् ॥ १७ ॥ स्त्री-सम्बन्धी भोगोंका परित्याग करके त्रिकाल स्नान करते हुए वायु पीकर रहनेसे यज्ञका फल प्राप्त होता है। सत्यसे मनुष्य स्वर्गको और दीक्षासे उत्तम कुलको पाता है ॥ १७ ॥

सलिलाशी भवेद् यस्तु सदाग्निः संस्कृतो द्विजः । मनुं साधयतो राज्यं नाकपृष्ठमनाशके ॥ १८ ॥ जो ब्राह्मण सदा जल पीकर रहता है, अग्निहोत्र करता है और मन्त्र-साधनामें संलग्न रहता है, उसे राज्य मिलता है और निराहारव्रत करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १८ ॥

उपवासं च दीक्षायामभिषेकं च पार्थिव । कृत्वा द्वादश वर्षाणि वीरस्थानाद् विशिष्यते ॥ १९ ॥ पृथ्वीनाथ! जो पुरुष बारह वर्षोंतकके लिये व्रतकी दीक्षा लेकर अन्नका त्याग करता और तीर्थोंमें स्नान करता रहता है, उसे रणभूमिमें प्राण त्यागनेवाले वीरसे भी बढ़कर उत्तम लोककी प्राप्ति होती है ॥ १९ ॥

अधीत्य सर्ववेदान् वै सद्यो दुःखद् विमुच्यते ।