भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 956, कुल 2566 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 956

उसके लिये बारह सूर्योंके समान तेजस्वी विमान प्रस्तुत किया जाता है। बहुमूल्यमणि, मुक्ता और मूँगे उस विमानकी शोभा बढ़ाते हैं। हंसश्रेणीसे परिवेष्टित और नागवीथीसे परिव्याप्त वह विमान कलरव करते हुए मोरों और चक्रवाकोंसे सुशोभित तथा ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित है। उसके भीतर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ बनी हुई हैं। राजन्! वह नित्य-निवासस्थान अनेक नर-नारियोंसे भरा हुआ होता है। यह बात महाभाग धर्मज्ञ ऋषि अंगिराने कही थी॥ ५६—५९॥
त्रयोदशे तु दिवसे प्राप्ते यः प्राशते हविः।
सदा द्वादशमासान् वै देवसत्रफलं लभेत्॥ ६०॥
जो बारह महीनोंतक सदा तेरहवें दिन हविष्यान्न भोजन करता है, उसे देवसत्रका फल प्राप्त होता है॥
रक्तपद्मोदयं नाम विमानं साधयेन्नरः।
जातरूपप्रयुक्तं च रत्नसंचयभूषितम्॥ ६१॥
देवकन्याभिराकीर्णं दिव्याभरणभूषितम्।
पुण्यगन्धोदयं दिव्यं वायव्यैरुपशोभितम्॥ ६२॥
उस मनुष्यको रक्तपद्मोदय नामक विमान उपलब्ध होता है, जो सुवर्णसे जटिल तथा रत्नसमूहसे विभूषित है। उसमें देवकन्याएँ भरी रहती हैं, दिव्य आभूषणोंसे विभूषित उस विमानकी बड़ी शोभा होती है। उससे पवित्र सुगन्ध प्रकट होती रहती है तथा वह दिव्य विमान वायव्यास्त्रसे शोभायमान होता है॥ ६१-६२॥
तत्र शंखपताके द्वे युगान्तं कल्पमेव च।
अयुतायुतं तथा पद्मं समुद्रं च तथा वसेत्॥ ६३॥
वह व्रतधारी पुरुष दो शंख, दो पताका (महापद्म), एक कल्प एवं एक चतुर्युग तथा दस करोड़ एवं चार पद्म वर्षोंतक ब्रह्मलोकमें निवास करता है॥ ६३॥
गीतगन्धर्वघोषैश्च भेरीपणवनिःस्वनैः।
सदा प्रह्लादितस्ताभिर्देवकन्याभिरिज्यते॥ ६४॥
वहाँ देवकन्याएँ गीत और वाद्योंके घोष तथा भेरी और पणवकी मधुर ध्वनिसे उस पुरुषको आनन्द प्रदान करती हुई सदा उसका पूजन करती हैं॥ ६४॥
चतुर्दशे तु दिवसे यः पूर्णे प्राशते हविः।
सदा द्वादशमासांस्तु महामेधफलं लभेत्॥ ६५॥
जो बारह महीनेतक प्रति चौदहवें दिन हविष्यान्न भोजन करता है, वह महामेध यज्ञका फल पाता है॥
अनिर्देश्यवयोरूपा देवकन्याः स्वलंकृताः।
मृष्टतप्तांगदधरा विमानैरुपयान्ति तम्॥ ६६॥