भारतकोश
महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व

Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,566 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 2566 में से

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पृष्ठ 97

जो विनीत भावसे विद्याध्ययन करते हैं, इन्द्रियोंको संयममें रखते हैं और मीठे वचन बोलते हैं, जो शास्त्रज्ञान और सदाचार दोनोंसे सम्पन्न हैं, अविनाशी परमात्माको जाननेवाले सत्पुरुष हैं, तात युधिष्ठिर! सभाओंमें बोलते समय हंससमूहोंकी भाँति जिनके मुखसे मेघके समान गम्भीर स्वरसे मनोहर मंगलमयी एवं अच्छे ढंगसे कही गयी बातें सुनायी देती हैं, उन ब्राह्मणोंको ही मैं चाहता हूँ। यदि राजा उन महात्माओंकी बातें सुननेकी इच्छा रखे तो वे उसे इहलोक और परलोकमें भी सुख पहुँचानेवाली होती हैं ।। ५—७ ।। ये चापि तेषां श्रोतारः सदा सदसि सम्मताः । विज्ञानगुणसम्पन्नास्तेभ्यश्च स्पृहयाम्यहम् ।। ८ ।। जो प्रतिदिन उन महात्माओंकी बातें सुनते हैं, वे श्रोता विज्ञानगुणसे सम्पन्न हो सभाओंमें सम्मानित होते हैं। मैं ऐसे श्रोताओंकी भी चाह रखता हूँ ।। ८ ।। सुसंस्कृतानि प्रयताः शुचीनि गुणवन्ति च । ददत्यन्नानि तृप्त्यर्थं ब्राह्मणेभ्यो युधिष्ठिर ।। ९ ।। ये चापि सततं राजंस्तेभ्यश्च स्पृहयाम्यहम् । राजा युधिष्ठिर! जो पवित्र होकर ब्राह्मणोंको उनकी तृप्तिके लिये शुद्ध और अच्छे ढंगसे तैयार किये हुए पवित्र तथा गुणकारक अन्न परोसते हैं, उनको भी मैं सदा चाहता हूँ ।। ९ १/२ ।। शक्यं ह्येवाहवे योद्धुं न दातुमनसूयितम् ।। १० ।। शूरा वीराश्च शतशः सन्ति लोके युधिष्ठिर । येषां संख्यायमानानां दानशूरो विशिष्यते ।। ११ ।। युधिष्ठिर! संग्राममें युद्ध करना सहज है। परंतु दोषदृष्टिसे रहित होकर दान देना सहज नहीं है। संसारमें सैकड़ों शूरवीर हैं; परंतु उनकी गणना करते समय जो उनमें दानशूर हो, वही सबसे श्रेष्ठ माना जाता है ।। धन्यः स्यां यद्यहं भूयः सौम्य ब्राह्मणकोऽपि वा । कुले जातो धर्मगतिस्तपोविद्यापरायणः ।। १२ ।। सौम्य! यदि मैं कुलीन, धर्मात्मा, तपस्वी और विद्वान् अथवा कैसा भी ब्राह्मण होता तो अपनेको धन्य समझता ।। १२ ।। न मे त्वत्तः प्रियतरो लोकेऽस्मिन् पाण्डुनन्दन । त्वत्तश्चापि प्रियतरा ब्राह्मणा भरतर्षभ ।। १३ ।। पाण्डुनन्दन! इस संसारमें मुझे तुमसे अधिक प्रिय कोई नहीं है; परंतु भरतश्रेष्ठ! ब्राह्मणोंको मैं तुमसे भी अधिक प्रिय मानता हूँ ।। १३ ।। यथा मम प्रियतमास्त्वत्तो विप्राः कुरूत्तम । तेन सत्येन गच्छेयं लोकान् यत्र स शान्तनुः ।। १४ ।।