महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 973, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंआश्विनमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके पद्मनाभ नामसे भगवान्की पूजा करनेवाला पुरुष सहस्र गोदानका पुण्यफल पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। १३ ।।
द्वादश्यां कार्तिके मासि पूज्य दामोदरेति च ।
गवां यज्ञमवाप्नोति पुमान् स्त्री वा न संशयः ।। १४ ।।
कार्तिकमासकी द्वादशी तिथिको दिन-रात उपवास करके भगवान् दामोदरकी पूजा करनेसे स्त्री हो या पुरुष गो-यज्ञका फल पाता है, इसमें संशय नहीं है ।। १४ ।।
अर्चयेत् पुण्डरीकाक्षमेवं संवत्सरं तु यः ।
जातिस्मरत्वं प्राप्नोति विन्द्याद् बहु सुवर्णकम् ।। १५ ।।
इस प्रकार जो एक वर्षतक कमलनयन भगवान् विष्णुका पूजन करता है, वह पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेवाला होता है और उसे बहुत-सी सुवर्ण-राशि प्राप्त होती है ।। १५ ।।
अहन्यहनि तद्भावमुपेन्द्रं योऽधिगच्छति ।
समाप्ते भोजयेद् विप्रानथवा दापयेद् घृतम् ।। १६ ।।
जो प्रतिदिन इसी प्रकार भगवान् विष्णुकी पूजा करता है, वह विष्णुभावको प्राप्त होता है। यह व्रत समाप्त होनेपर ब्राह्मणोंको भोजन करावे अथवा उन्हें घृत दान करे ।। १६ ।।
अतः परं नोपवासो भवतीति विनिश्चयः ।
उवाच भगवान् विष्णुः स्वयमेव पुरातनम् ।। १७ ।।
इस उपवाससे बढ़कर दूसरा कोई उपवास नहीं है, इसे निश्चय समझना चाहिये। साक्षात् भगवान् विष्णुने ही इस पुरातन व्रतके विषयमें बताया है ।। १७ ।।
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विष्णोर्द्वादशकं नाम
नवाधिकशततमोऽध्यायः ।। १०९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें भगवान् विष्णुका द्वादशी-व्रत नामक एक सौ नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १०९ ।।