महाभारत (खंड ६) - अनुशासन, आश्वमेधिक, आश्रमवासिक, मौसल, महाप्रस्थानिक, स्वर्गारोहण व हरिवंश पर्व
Mahabharata (Vol 6) - Anushasana to Harivamsa Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 998, कुल 2566 में से
संदर्भ में पढ़ेंषड्भागपरिशुद्धं च कृषेर्भागमुपार्जितम् । वैश्यो ददद् द्विजातिभ्यः पापेभ्यः परिमुच्यते ॥ १९ ॥ जो वैश्य खेतीसे अन्न पैदा करके उसका छठा भाग राजाको देकर बचे हुएमेंसे शुद्ध अन्नका ब्राह्मणको दान करता है, वह पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १९ ॥
अवाप्य प्राणसंदेहं कार्कश्येन समार्जितम् । अन्नं दत्त्वा द्विजातिभ्यः शूद्रः पापात् प्रमुच्यते ॥ २० ॥ शूद्र भी यदि प्राणोंकी परवा न करके कठोर परिश्रमसे कमाया हुआ अन्न ब्राह्मणोंको दान करता है तो पापसे छुटकारा पा जाता है ॥ २० ॥
औरसेन बलेनान्नमर्जयित्वाविहिंसकः । यः प्रयच्छति विप्रेभ्यो न स दुर्गाणि पश्यति ॥ २१ ॥ जो किसी प्राणीकी हिंसा न करके अपनी छातीके बलसे पैदा किया हुआ अन्न विप्रोंको दान करता है, वह कभी संकटका अनुभव नहीं करता ॥ २१ ॥
न्यायेनैवाप्तमन्नं तु नरो हर्षसमन्वितः । द्विजेभ्यो वेदवृद्धेभ्यो दत्त्वा पापात् प्रमुच्यते ॥ २२ ॥ न्यायके अनुसार अन्न प्राप्त करके उसे वेदवेत्ता ब्राह्मणोंको हर्षपूर्वक दान देनेवाला मनुष्य अपने पापोंके बन्धनसे मुक्त हो जाता है ॥ २२ ॥
अन्नमूर्जस्करं लोके दत्त्वोर्जस्वी भवेन्नरः । सतां पन्थानमावृत्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २३ ॥ संसारमें अन्न ही बलकी वृद्धि करनेवाला है, अतः अन्नका दान करके मनुष्य बलवान् होता है और सत्पुरुषोंके मार्गका आश्रय लेकर समस्त पापोंसे छूट जाता है ॥ २३ ॥
दानवद्भिः कृतः पन्था येन यान्ति मनीषिणः । ते हि प्राणस्य दातारस्तेभ्यो धर्मः सनातनः ॥ २४ ॥ दाता पुरुषोंने जिस मार्गको चालू किया है, उसीसे मनीषी पुरुष चलते हैं। अन्नदान करनेवाले मनुष्य वास्तवमें प्राणदान करनेवाले हैं। उन्हीं लोगोंसे सनातन धर्मकी वृद्धि होती है ॥ २४ ॥
सर्वावस्थं मनुष्येण न्यायेनान्नमुपार्जितम् । कार्यं पात्रागतं नित्यमन्नं हि परमा गतिः ॥ २५ ॥ मनुष्यको प्रत्येक अवस्थामें न्यायतः उपार्जित किया हुआ अन्न सत्पात्रके लिये अर्पित करना चाहिये; क्योंकि अन्न ही सब प्राणियोंका परम आधार है ॥ २५ ॥
अन्नस्य हि प्रदानेन नरो रौद्रं न सेवते । तस्मादन्नं प्रदातव्यमन्यायपरिवर्जितम् ॥ २६ ॥ अन्न-दान करनेसे मनुष्यको कभी नरककी भयंकर यातना नहीं भोगनी पड़ती; अतः न्यायोपार्जित अन्नका ही सदा दान करना चाहिये ॥ २६ ॥