भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

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तेरहवाँ उल्लास : देवता, जलाशयादि-प्रतिष्ठा एवं वास्तु-यागादि की विधि । १०५ ईशान-कोण में 'केतु' की और चन्द्र के चारों ओर 'नक्षत्र-मण्डल' की पूजा करे । (८३-८४) । १. 'सूर्य' रक्त-वर्ण, २. 'चन्द्र' श्वेत-वर्ण, ३. 'मङ्गल' अरुण-वर्ण, ४. 'बुध' पाण्डु-वर्ण, ५. 'बृहस्पति' पीत-वर्ण, ६ 'शुक्र' श्वेत-वर्ण, ७. 'शनि' कृष्ण-वर्ण, ८. 'राहु' और 'केतु' अनेक-वर्ण हैं । 'सूर्य' के दो हाथों में दो पद्म और दो हाथों में वर-अभय हैं- ऐसा उन्हें चार हाथों वाला ध्यान करे (८५) । 'चन्द्र' के दो हाथों में वर-मुद्रा और अमृत का ध्यान करे । 'मङ्गल' को कुछ कुबड़े शरीरवाला और दोनों हाथों से दण्ड लिए ध्यान करे । 'बुध' को बाल-रूप और ललाट पर गिरे हुए घुँघराले केशों सहित ध्यान करे (८६-८७) । 'बृहस्पति' को यज्ञोपवीत-युक्त और दो हाथों में पुस्तक और अक्ष-माला लिए ध्यान करे । 'शुक्र' का भी ध्यान ऐसा ही करे । शनि को काना और खञ्ज ध्यान करे (८८) । 'राहु' को विकृत, क्रूर-कर्मा मस्तक के रूप में और 'केतु' को, विकृत, क्रूर-कर्मा धड़ के रूप में ध्यान करे । उत्तम साधक उक्त प्रकार नौ ग्रहों का ध्यानपूर्वक पूजन कर अष्ट-दलों में पूर्वादि-क्रम से इन्द्रादि दिक्- पालों की पूजा करे । १. पीत-वर्ण 'इन्द्र' को सहस्राक्ष, ऐरावतारूढ़, पीले रेशम वस्त्र पहने, हाथ में वज्र लिए ध्यान कर उनकी पूजा करे । २. रक्त-वर्ण 'अग्नि' को छागारूढ़, हाथ में शक्ति लिए और ३. कृष्ण-वर्ण 'यम' को महिषारूढ़, हाथ में दण्ड लिए ध्यान करे । ४. श्याम-वर्ण 'निरृति' को अश्वारूढ़ खड्ग लिए; ५. शुक्ल-वर्ण 'वरुण' को मकरारूढ़, पाश लिए; ६ कृष्ण-वर्ण 'वायु' को मृगारूढ़, अंकुश लिए; ७. सुवर्ण-वर्ण 'कुबेर' को रत्न- सिंहासनारूढ़, यक्षों द्वारा स्तुत, पाश व अंकुश लिए; ८. शुक्ल-वर्ण 'ईशान' को वृषारूढ़, व्याघ्र-चर्म पहने, त्रिशूल व वर-मुद्रा लिए ध्यान करे (८६-६५) । इन सबकी ध्यानपूर्वक यथा-क्रम पूजा कर भूपूर के बाहर ऊर्ध्व और अधो वृत्त में क्रमशः 'ब्रह्मा' और 'अनन्त' की पूजा करे । तब द्वार-देवताओं को पूजा करे (६६) - १ उग्र, २ भीम, ३ प्रचण्ड, ४ ईश-ये चार पूर्व-द्वारी; १ जयन्त, २ क्षेत्रपाल, ३ नकुलेश, ४ बृहत्-शिरा - ये दक्षिण-द्वारी; १ वृक, २ अश्व, ३ आनन्द, ४ दुर्जय-ये पश्चिम-द्वारी; १ त्रिशिरा, २ पुरुजित, ३ भीमनाद, ४ महादेव-ये उत्तर-द्वारी हैं । ये सभी द्वार- देवता शस्त्रधारी हैं (६७-६८) । हे सुव्रते ! ब्रह्मा और अनन्त के ध्यान सुनो :- रक्तोत्पल-निभो ब्रह्मा चतुरास्यश्चतुर्भुजः । हंसारूढो वराभीति-माला-पुस्तक-पाणिकः ।। अर्थात् 'ब्रह्मा' रक्त-कमल के समान प्रभाववाले, चतुर्मुख, चतुर्भुज, हंस पर आसीन हैं और हाथों में वर, अभय, अक्षमाला व पुस्तक लिए हैं (६६-१००) । हिम-कुन्देन्दु-धवलः सहस्राक्षः सहस्र-पात् । सहस्र-पाणि-वदनो ध्येयोऽनन्तः सुरासुरैः ।। अर्थात् 'अनन्त' हिम, कुन्द, पुष्प और चन्द्रमा के समान उज्ज्वल वर्णवाले, सहस्र-नेत्र, सहस्र-चरण, सहस्र-मुख हैं और सुर व असुरों द्वारा ध्येय हैं (१०१) । हे प्रिये ! ध्यान, पूजा-विधि और यन्त्र का वर्णन हो चुका । अब 'वास्तु' से लेकर 'अनन्त' तक सब देवों के मन्त्र भी सुनो (१०२)- १ वास्तु-मन्त्र-क्षाँ क्षीँ क्षूँ क्षैँ क्षौं क्षः । २ सूर्य-मन्त्र-ॐ ह्रीँ तिग्म-रश्मे आरोग्यदाय स्वाहा ३ सोम-मन्त्र-क्लीँ ह्रीँ ऐँ अमृत-कराऽमृतं प्लावय प्लावय स्वाहा ४ मङ्गल-मन्त्र-ऐँ ह्राँ ह्रीँ सर्व-दुष्टान् नाशय नाशय स्वाहा फा०-१४