भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 72, कुल 139 में से

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नवाँ उल्लास--दस प्रकार के संस्कार श्री सदाशिव ने कहा—हे सुव्रते ! सभी वर्णों और आश्रमों के आचार और धर्म को मैंने तुमसे कहा । अब सभी वर्णों के 'संस्कार' कहता हूँ, सुनो (१) । हे देवि ! 'संस्कार' के बिना देह की शुद्धि नहीं होती । असंस्कृत व्यक्ति देव और पैत्र कर्मों के करने का अधिकारी नहीं हो पाता । इसलिए इस लोक और परलोक में अपना कल्याण चाहनेवाले ब्राह्मण, विप्रादि वर्णों को प्रयत्न करके अपने-अपने वर्ण के लिए निर्दिष्ट 'संस्कार' को अवश्य करना चाहिए (२-३) । १ जीव-सेक अर्थात् गर्भाधान, २ पुंसवन, ३ सीमन्तोन्नयन, ४ जातकर्म, ५ नामकरण, ६ निष्क्रमण, ७ अन्नप्राशन, ८ चूड़ाकरण (मुण्डन), ६ उपनयन (यज्ञोपवीत) और १० विवाह—ये 'दस संस्कार' कहे हैं। शूद्र और सामान्य जाति में उपनयन नहीं होता, अतः उनके लिए नौ ही संस्कार हैं । द्विजों के लिए दस सस्कार कहे हैं (४) । हे वरारोहे ! नित्य, नैमित्तिक और काम्य सभी कर्म शम्भु द्वारा बताए मार्ग से करे (५-६) । हे प्रिये ! जिस-जिस कर्म में जो-जो विधान निर्दिष्ट हैं, वह सब ब्रह्मा-रूप से मैंने पहले ही प्रकट कर दिये हैं (७) । सभी संस्कार और ब्राह्मणादि वर्ण-भेद के अनुसार अन्यान्य मन्त्र मैंने प्रकाशित किए हैं (८) । हे कालिके ! सत्य, त्रेता और द्वापर युगों में उन-उन सब कर्मों के अनुष्ठान-काल में पहले प्रणव लगाकर मन्त्रों का प्रयोग करे (६) । हे परमेशानि ! शङ्कर के आदेशानुसार कलि-युग में पहले ॐकार के स्थान पर माया-बीज 'ह्रीं' लगावे और उन उन मन्त्रों द्वारा सारे कर्म करे (१०) । निगम, आगम, तन्त्र, वेद और संहिता में समस्त मन्त्र मेरे ही द्वारा कहे गए हैं । युग-भेद से प्रयोग-भेद में कहे हैं (११) । हे कल्याणि ! कलि-काल के मनुष्यों के प्राण अन्न में रहते हैं, जिससे वे तेज-हीन होते हैं । उन्हीं के हित के लिए 'कुल-धर्म' का निरूपण किया गया है (१२) । कलियुग के दुर्बल जीव परिश्रम सहने में असमर्थ हैं, उनके लिए संस्कारादि की क्रिया संक्षेप में तुमसे कहता हूँ । हे सुर-वन्दिते ! 'कुशण्डिका' सभी शुभ कर्मों के आदि में की जाती है । अतः पहले उसे बताता हूँ, सुनो— बुद्धिमान् व्यक्ति फूस, अङ्गार आदि से रहित, रमणीय, परिष्कृत स्थान में एक हाथ का स्थण्डिल बनाए (१३-१५) । उस मण्डल के पूर्वाग्र में तीन रेखाएँ खींचे । उन्हें कूर्च—'हूँ' मन्त्र से अभ्युक्षित कर वह्नि-बीज 'रं' से अग्नि लाये (१६) । वाग्भव अर्थात् 'ऐं' मन्त्र का स्मरण करते हुए मण्डल के बगल में अग्नि को स्थापित करे (१७) । तब दाएँ हाथ से उसमें जलती हुई लकड़ी लेकर निम्न मन्त्र का उच्चारण करते हुए दक्षिण दिशा में राक्षस का अंश छोड़ दे (१८)— ह्रीं क्रव्यादेभ्यो नमः स्वाहा । इसी प्रकार प्रतिष्ठित अग्नि को दोनों हाथों से उठाकर 'मायाद्या' अर्थात् आदि में माया-बीज 'ह्रीं' लगा कर व्याहृति को स्मरण करते हुए अपने आगे अंकित तीन रेखाओं पर स्थापित तृण-काष्ठ द्वारा उक्त अग्नि को [ ६३ ]

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