भारतकोश
महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

महानिर्वाण तन्त्र (हिन्दी अनुवाद सहित)

Mahanirvana Tantra with Hindi Translation

शिव-पार्वती संवाद द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर · कल्याण मन्दिर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished139 पृष्ठ

पृष्ठ 74, कुल 139 में से

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नवाँ उल्लास : दस प्रकार के संस्कार | ६५ यावद् यज्ञ-समापनं तावद् भवद्भिः स्थातव्यम् । अर्थात् 'जब तक यज्ञ समाप्त नहीं होता, तब तक आप यहाँ स्थित रहें।' इस प्रकार प्रार्थना कर उन्हें नमस्कार करे (३४-३५) । अग्नि के ईशान कोण से आरम्भ कर ब्रह्मा के निकट तक तीन बार स-जल हस्त से पर्युक्षण करे। फिर तीन बार अग्नि को प्रोक्षित कर उसो अर्थात् पहले जिस पथ से आए थे, उसी पथ से लौटकर अपने आसन पर बैठ जाय । तब मण्डल की उत्तर-दिशा में कुछ कुशों को उत्तराभिमुख करके बिछाये (३६-३७) । उसो पर स-जल प्रोक्षणो-पात्र, आज्य-स्थालो, समिद् और कुश आदि सभी यज्ञीय वस्तुओं को रखे (३८) । फिर स्रुकू, स्रुवा आदि रखकर 'ह्लां हौं ह्रूं' मन्त्र का उच्चारण करते हुए दिव्य दृष्टि अर्थात् एकटक दृष्टि से उन सबको देखे और प्रोक्षण द्वारा उन्हें संस्कृत कर साधक भूमि पर दाएँ घुटने के बल बैठकर 'स्रुव' नामक यज्ञ-पात्र में रखे घृत को 'स्रुक' से लेकर अपने कल्याण को कामना करते हुए निम्न मन्त्र से तीन आहु- तियाँ दे (३६-४०)— ह्रीं विष्णवे स्वाहा । इसी प्रकार अर्थात् 'स्रुक' के द्वारा 'स्रुव' में रखा घृत लेकर प्रजापति देव का ध्यान करते हुए वायु- कोण से आरम्भ कर अग्नि-कोण तक होम करे (४१)— ह्रौं प्रजापतये स्वाहा । पुनः घृत लेकर पुरन्दर देव का ध्यान करते हुए नैर्ऋत-कोण से ईशान-कोण तक घृत-धारा प्रदान करे (४२)— ह्रौं पुरन्दराय स्वाहा । हे परमेश्वरि ! फिर अग्नि के उत्तर, दक्षिण और मध्य में क्रमशः अग्नि, सोम और अग्निषोम को तीन आहुतियाँ प्रदान करे— ह्रीं अग्नये नमः । ह्रीं सोमाय नमः । ह्रीं अग्नी-षोमाभ्यां नमः । अब विधेय कर्म में कहे होम को करे (४३-४४) । तीन आहुति देने तक के उक्त कर्म को 'धारा-होम' कहते हैं (४५) । जिस देवता के लिए आहुति दे, उसो देवता के उद्देश्य से देय वस्तु का उल्लेख करे । यथा— ह्रौं विष्णवे स्वाहा, हविरिदं विष्णवे । इस प्रकार प्रकृत कर्म को समाप्त कर 'स्विष्ट-कृत होम' करे (४६) । हे वरानने ! कलि-काल में 'प्राय- श्चित्त होम' नहीं होता, 'स्विष्टकृत' और 'व्याहृति होम' द्वारा प्रायश्चित्त हो जाता है (४७) । पूर्ववत् हवि लेकर अर्थात् स्रुव में रखे घृत को स्रुक द्वारा ग्रहण कर मन-ही-मन ब्रह्मा का स्मरण कर निम्न मन्त्र से आहुति प्रदान करे (४८)— ह्रौं अस्मिन् कर्मणि देवेश ! प्रमादाद् भ्रमतोऽपि वा । न्यूनाधिकं कृतं यच्च सर्वं स्विष्ट-कृतं कुरु ।। स्वाहा । अर्थात् हे देवेश ! प्रमाद या भ्रम-वश इस कार्य में जो कुछ कम या अधिक हुआ हो, उस सबको मेरे लिए उत्तम फल-दायक करो (४६) । फा—६

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