माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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११४ माण्डूक्योपनिषद् [ गौ० का०
| घटाकाशादिप्रलयस्तद्वद्देहादि- | काशादिका नाश होता है उसी प्रकार देहादि * संघातकी उत्पत्तिसे जीवकी उत्पत्ति होती है और उनका लय होनेपर जीवोंका इस आत्मामें लय हो जाता है । तात्पर्य यह है कि स्वतः उनका लय नहीं होता॥४॥ |
| संघातोत्पत्त्या जीवोत्पत्तिस्त- | |
| त्प्रलये च जीवानामिहात्मनि | |
| प्रलयो न स्वत इत्यर्थः ॥ ४ ॥ |
आत्माकी असङ्गतामें दृष्टान्त
| सर्वदेहेष्वात्मैकत्व एकस्मि- | सम्पूर्ण देहोंमें एक ही आत्मा होनेपर तो एक आत्माके जन्म-मरण और सुख-दुःखादिमान् होनेपर सभीको उसका सम्बन्ध होगा तथा कर्म और फलकी संकरता हो जायगी [अर्थात् कर्म किसीका होगा और उसका फल कोई और ही भोगेगा] इस प्रकार जो द्वैतवादी कहते हैं उनके प्रति कहा जाता है— |
| ञ्जनन मरणसुखादिमत्यात्मनि | |
| सर्वात्मनां तत्सम्बन्धः क्रियाफल- | |
| साङ्कर्यं च स्यादिति य आहुद्वैति- | |
| नस्तान्प्रतीदमुच्यते— |
यथैकस्मिन्घटाकाशे रजोधूमादिभिर्युते ।
न सर्वे संप्रयुज्यन्ते तद्वज्जीवाः सुखादिभिः ॥ ५ ॥
जिस प्रकार एक घटाकाशके धूलि और धुएँ आदिसे युक्त होनेपर समस्त घटाकाश उनसे युक्त नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुखादि धर्मोंसे लिप्त नहीं होते । [अर्थात् एक जीवके सुखादिमान् होनेपर सब जीव सुखादिमान् नहीं हो जाते ] ॥ ५ ॥
* यहाँ 'देह' शब्दसे लिङ्ग-देह समझना चाहिये, क्योंकि जीवत्वका नाश लिङ्ग-देहके नाशसे ही हो सकता है, स्थूल देहके नाशसे नहीं ।