भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 146
१२६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
कोशा आत्मवन्तोऽन्तरतमेन, स हि सर्वेषां जीवननिमित्तत्वाज्जीवः ।जिस अन्तरतम आत्माके कारण पाँचों कोश आत्मवान् हैं, वही सबके जीवनका निमित्त होनेके कारण 'जीव' कहलाता है ।
कोऽसावित्याह—पर एवात्मा यः पूर्वं "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म" (तै० उ० २ । १) इति प्रकृतः। यस्मादात्मनः खममायादिवदाकाशादिक्रमेण रसादयः कोशलक्षणाः संघाता आत्ममायाविसर्जिता इत्युक्तम् । स आत्मास्माभिर्यथा खं तथेति संप्रकाशित "आत्मा ह्याकाशवत्" (अद्वैत० ३) इत्यादिश्लोकैः । न तार्किकपरिकल्पितात्मवत्पुरुषबुद्धिप्रमाणगम्य इत्यभिप्रायः ॥११॥वह कौन है ? इसपर कहते हैं—वह परमात्मा ही है, जिसका पहले "सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म " इत्यादि वाक्योंमें प्रसङ्ग है और जिस आत्मासे खप्न और माया आदिके समान आकाशादि क्रमसे कोशरूप संघात आत्माकी मायासे ही रचे गये हैं-ऐसा कहा गया है । उस आत्माको हमने "आत्मा ह्याकाशवत्" इत्यादि श्लोकोंमें, जैसा आकाश है उसीके समान प्रकाशित किया है । तात्पर्य यह है कि वह तार्किकोंके कल्पना किये हुए आत्माके समान मनुष्यकी बुद्धिसे प्रमाणित होनेवाला नहीं है ॥ ११ ॥

द्वयोर्द्वयोर्मधुज्ञाने परं ब्रह्म प्रकाशितम् ।
पृथिव्यामुदरे चैव यथाकाशः प्रकाशितः ॥ १२ ॥

लोकमें, जिस प्रकार पृथिवी और उदरमें एक ही आकाश प्रकाशित हो रहा है उसी प्रकार [ बृहदारण्योक्त ] मधु ब्राह्मणमें [ अध्यात्म और अधिदैवत-इन ] दोनों स्थानोंमें एक ही ब्रह्म निरूपित किया गया है ॥१२॥