माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| १६६ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| यदैवात्मसत्यानुबोधो जातस्तदैवात्मसंस्थं विषयाभावादग्न्युष्णवदात्मन्येव स्थितं ज्ञानम् ; अजाति जातिवर्जितम् , समतां गतं परं साम्यमापन्नं भवति । | जिस समय भी आत्मसत्यका बोध होता है उसी समय आत्मसंस्थ अर्थात् विषयका अभाव होनेके कारण अग्निकी उष्णताके समान आत्मामें ही स्थित ज्ञान अजाति—जन्मरहित और समताको प्राप्त हो जाता है । |
| यदादौ प्रतिज्ञातमतो वक्ष्याम्यकार्पण्यमजाति समतां गतमितीदं तदुपपत्तितः शास्त्रतथोक्तमुपसंह्रियते, अजाति समतां गतमिति। एतस्मादात्मसत्यानुबोधात्कार्पण्यविषयमन्यत् | पहले (इस प्रकरणके दूसरे श्लोकमें) जो प्रतिज्ञा की थी कि 'इसलिये मैं समान भावको प्राप्त, अजन्मा अकृपणताका वर्णन करूँगा' उस पूर्वकथनका ही यहाँ 'अजाति समतां गतम्' ऐसा कहकर युक्ति और शास्त्रद्वारा उपसंहार किया गया है । "हे गार्गि ! जो पुरुष इस अक्षर ब्रह्मको बिना जाने ही इस लोकसे चला जाता है वह कृपण है" इस श्रुतिके अनुसार कृपणताका विषय तो इस आत्मसत्यके बोधसे भिन्न ही है । तात्पर्य यह है कि इस तत्त्वको प्राप्त कर लेनेपर तो हर कोई कृतकृत्य ब्राह्मण (ब्रह्मनिष्ठ) हो जाता है ॥ ३८॥ |
| "यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः" (बृ० उ० ३ । ८ । १०) इति श्रुतेः । प्राप्यैतत्सर्वः कृतकृत्यो ब्राह्मणो भवतीत्यभिप्रायः॥३८॥ |