माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| २१० | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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उपक्रमका उपसंहार
| उक्तैर्हेतुभिरजमेकं ब्रह्मेति सिद्धं यत्पुनरादौ प्रतिज्ञातं तत्फलोपसंहारार्थोऽयं श्लोकः— | पूर्वोक्त हेतुओंसे यह सिद्ध हुआ कि एक अजन्मा ब्रह्म ही है । अब, पहले जिसकी प्रतिज्ञा की है उसके फलका उपसंहार करनेके लिये यह श्लोक है— |
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अजातं जायते यस्मादजातिः प्रकृतिस्ततः ।
प्रकृतेरन्यथाभावो न कथंचिद्भविष्यति ॥ २९ ॥
क्योंकि अजन्मा [चित्त] का ही जन्म होता है इसलिये अजाति ही उसका स्वभाव है; और स्वभावकी विपरीतता किसी प्रकार नहीं होगी ॥ २९ ॥
| अजातं यच्चित्तं ब्रह्मैव जायत इति वादिभिः परिकल्प्यते तदजातं जायते यस्मादजातिः प्रकृतिस्तस्य । ततस्तस्मादजातरूपायाः प्रकृतेरन्यथाभावो जन्म न कथंचिद्भविष्यति ॥ २९ ॥ | अजात जो ब्रह्मरूप चित्त है वही उत्पन्न होता है—ऐसी वादियोंद्वारा कल्पना की जाती है; क्योंकि उस अजातका ही जन्म होता है इसलिये अजाति उसका स्वभाव है। तब, इसीलिये उस अजातरूप स्वभावका जन्मरूप विपरीतभाव किसी प्रकार नहीं होगा ॥ २९ ॥ |
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| अयं चापर आत्मनः संसारमोक्षयोः परमार्थसद्भाववादिनां दोष उच्यते— | आत्माके संसार और मोक्ष—दोनोंहीका पारमार्थिक अस्तित्व स्वीकार करनेवाले वादियोंके पक्षका यह एक दूसरा दोष बतलाया जाता है— |
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