भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 236
२१६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०

| यथा स्वप्नः स्वप्नदृश एव सन्साधारणविद्यमानवस्तुवदवभासते तथा तत्कारणत्वात्साधारणविद्यमानवस्तुवदवभासमानं न तु साधारणं विद्यमानवस्तु स्वप्नवदेवेत्यभिप्रायः ॥ ३७ ॥ | जिस प्रकार स्वप्न स्वप्नद्रष्टाको ही सत् अर्थात् जागरण विद्यमान वस्तुके समान भासता है उसी प्रकार उसका कारण होनेसे जाग्रत्-की भी साधारण विद्यमान वस्तुके समान प्रतीति होती है। किन्तु वस्तुतः स्वप्नके समान ही वह साधारण विद्यमान वस्तु है नहीं—यह इसका अभिप्राय है ॥ ३७ ॥ |


| ननु समकारणत्वेऽपि जागरितवस्तुनो न स्वप्नवद्वस्तुत्वम् । अत्यन्तचलो हि स्वप्नो जागरितं तु स्थिरं लक्ष्यते । | शंका—समके कारण होनेपर भी जाग्रदवस्थाका स्वप्नके समान अवस्तुत्व नहीं है, क्योंकि स्वप्न तो अत्यन्त चञ्चल है, किन्तु जाग्रद्-अवस्था स्थिर देखी जाती है । | | सत्यमेवमविवेकिनां स्यात् । विवेकिनां तु न कस्यचिद्वस्तुन उत्पादः प्रसिद्धोऽतः— | समाधान—ठीक है, अविवेकियोंके लिये ऐसी बात हो सकती है; किन्तु विवेकियोंकी तो किसी वस्तुकी उत्पत्ति सिद्ध ही नहीं है । अतः— |

उत्पादस्याप्रसिद्धत्वादजं सर्वमुदाहृतम् ।

न च भूतादभूतस्य संभवोऽस्ति कथञ्चन ॥ ३८ ॥

उत्पत्तिके प्रसिद्ध न होनेके कारण सब कुछ अज ही कहा जाता है। इसके सिवा सत् वस्तुसे असत्की उत्पत्ति किसी प्रकार हो भी नहीं सकती ॥ ३८ ॥