भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 247

शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २२७


अस्पन्दमानं स्पन्दनवर्जितं तदेवालातमृज्वाद्याकारेणाजायमानमनाभासमजं यथा;तथाविद्यया स्पन्दमानमविद्योपरमेऽस्पन्दमानं जात्याद्याकारेणानाभासमजमचलं भविष्यतीत्यर्थः ॥ ४८ ॥जिस प्रकार वही अलात अस्पन्दमान—स्पन्दनसे रहित होनेपर ऋजु आदि आकारोंमें भासित न होनेके कारण अनाभास और अज रहता है उसी प्रकार अविद्यासे स्पन्दित होनेवाला विज्ञान अविद्याकी निवृत्ति होनेपर जाति आदि रूपसे स्पन्दित न होकर अनाभास, अज और अचल हो जायगा—ऐसा इसका तात्पर्य है ॥ ४८ ॥

किं च—इसके सिवा—

अलाते स्पन्दमाने वै नाभासा अन्यतोभुवः ।
न ततोऽन्यत्र निस्पन्दान्नालातं प्रविशन्ति ते ॥ ४९ ॥

अलातके स्पन्दित होनेपर भी वे आभास किसी अन्य कारणसे नहीं होते, तथा उसके स्पन्दरहित होनेपर भी कहीं अन्यत्र नहीं चले जाते और न वे अलातमें ही प्रवेश करते हैं ॥ ४९ ॥

तस्मिन्नेवालाते स्पन्दमान ऋजुवक्राद्याभासा अलातादन्यतः कुतश्चिदागत्यालाते नैव भवन्ति इति नान्यतोभुवः । न च तस्मान्निस्पन्दादलातादन्यत्र निर्गताः। न च निस्पन्दमलातमेव प्रविशन्ति ते ॥ ४९ ॥उस अलातके स्पन्दित होनेपर भी वे सीधे-टेढ़े आदि आभास अलातसे भिन्न कहीं अन्यत्रसे आकर अलातमें उपस्थित नहीं हो जाते; अतः वे किसी अन्यसे होनेवाले भी नहीं हैं । तथा निस्पन्द हुए उस अलातसे वे कहीं अन्यत्र नहीं चले जाते और न उस निस्पन्द अलातमें ही प्रवेश कर जाते हैं ॥४९॥