माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] अलातशान्तिप्रकरण २३१
इस प्रकार न तो बाह्य पदार्थ ही चित्तसे हुए हैं और न चित्त ही बाह्य पदार्थोंसे उत्पन्न हुआ है। अतः मनीषि लोग कार्य-कारणकी अनुत्पत्ति ही निश्चित करते हैं ॥ ५४ ॥
| एवं यथोक्तेभ्यो हेतुभ्य आत्म-विज्ञानस्वरूपमेव चित्तमिति न चित्तजा बाह्यधर्मा नापि बाह्यधर्मजं चित्तम् । विज्ञानस्वरूपाभासमात्रत्वात्सर्वधर्माणाम् । एवं न हेतोः फलं जायते नापि फलाद्धेतुरिति हेतुफलयोरजातिं हेतुफलाजातिं प्रविशन्त्यध्यवस्यन्ति आत्मनि हेतुफलयोरभावमेव प्रतिपद्यन्ते ब्रह्मविद इत्यर्थः ॥ ५४॥ | इस प्रकार उपर्युक्त हेतुओंसे चित्त आत्मविज्ञानस्वरूप ही है; न तो बाह्य पदार्थ ही चित्तसे उत्पन्न हुए हैं और न चित्त ही बाह्य पदार्थोंसे उत्पन्न हुआ है; क्योंकि सारे ही धर्म विज्ञानस्वरूपके आभासमात्र हैं। इस प्रकार न तो हेतुसे फलकी उत्पत्ति होती है और न फलसे हेतुकी। अतः मनीषी लोग हेतु और फलकी अनुत्पत्ति ही निश्चित करते हैं। तात्पर्य यह कि ब्रह्मवेत्ता लोग आत्मामें हेतु और फलका अभाव ही देखते हैं॥५४॥ |
हेतु-फलभावके अभिनिवेशका फल
| ये पुनर्हेतुफलयोरभिनिविष्टास्तेषां किं स्यादित्युच्यते—धर्माधर्माख्यस्य हेतोरहं कर्ता मम धर्माधर्मो तत्फलं कालान्तरे क्वचित्प्राणिनिकाये जातो भोक्ष्य इति— | किन्तु जिनका हेतु और फलमें अभिनिवेश है उनका क्या होगा ? इसपर कहा जाता है—धर्माधर्मसंज्ञक हेतुका मैं कर्ता हूँ, धर्म और अधर्म मेरे हैं, कालान्तरमें किसी प्राणीके शरीरमें उत्पन्न होकर उनका फल भोगूँगा—इस प्रकार |
यावद्धेतुफलावेशस्तावद्धेतुफलोद्भवः ।
क्षीणे हेतुफलावेशे संसारं न प्रपद्यते ॥ ५५ ॥