माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २६२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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तेषां निश्चयः कर्त्तव्यो नित्य-निश्चितस्वरूपा इत्यर्थः। न संदिह्यमानस्वरूपा एवं नैवं चेति।|निश्चय भी नहीं करना है; अर्थात् वे नित्यनिश्चितस्वरूप हैं—'ऐसे हैं अथवा नहीं हैं' इस प्रकार सन्दिग्धस्वरूप नहीं हैं। यस्य मुमुक्षोरेवं यथोक्तप्रकारेण सर्वदा बोधनिश्चयनिरपेक्षतात्मार्थं परार्थं वा यथा सविता नित्यं प्रकाशान्तरनिरपेक्षः स्वार्थं परार्थं चेत्येवं भवति क्षान्तिबोधकर्त्तव्यतानिरपेक्षता सर्वदा स्वात्मनि सोऽमृतत्वायामृतभावाय कल्पते मोक्षाय समर्थो भवतीत्यर्थः ॥९२॥|जिस मुमुक्षुको इस तरह—उपर्युक्त प्रकारसे अपने अथवा पराये-लिये सर्वदा बोधनिश्चय-सम्बन्धिनी निरपेक्षता है; जिस प्रकार सूर्य अपने अथवा पराये लिये सदा ही प्रकाशान्तरकी अपेक्षा नहीं करता उसी प्रकार जिसे सर्वदा अपने आत्मामें क्षान्ति-बोधकर्त्तव्यताकी निरपेक्षता रहती है वह अमृतत्व-अमृतभाव अर्थात् मोक्षके लिये समर्थ होता है ॥९२॥
तथा नापि शान्तिकर्त्तव्यतात्मनीत्याह—|इसी प्रकार आत्मामें शान्तिकर्त्तव्यता भी नहीं है—इसी आशयसे कहते हैं—
आदिशान्ता ह्यनुत्पन्नाः प्रकृत्यैव सुनिर्वृताः ।
सर्वे धर्माः समाभिन्ना अजं साम्यं विशारदम् ॥ ९३ ॥
सम्पूर्ण आत्मा नित्यशान्त, अजन्मा, स्वभावसे ही अत्यन्त उपरत तथा सम और अभिन्न हैं। [इस प्रकार क्योंकि] आत्मतत्त्व अज, समतारूप और विशुद्ध है [इसलिये उसकी शान्ति अथवा मोक्ष कर्तव्य नहीं है] ॥९३॥