माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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[ ५ ]
| कारिकाप्रतीकानि | प्रकरणाङ्कः | कारिकाङ्कः | पृष्ठम् |
|---|---|---|---|
| प्रकृत्याकाशवज्ज्ञेयाः | ४ | ९१ | २६० |
| प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वम् | ४ | २४ | २०२ |
| प्रज्ञप्तेः सनिमित्तत्वम् | ४ | २५ | २०४ |
| प्रणवं हीश्वरं विद्यात् | १ | २८ | ६५ |
| प्रणवो ह्यपरं ब्रह्म | १ | २६ | ६३ |
| प्रपञ्चो यदि विद्येत | १ | १७ | ५० |
| प्रभवः सर्वभावानाम् | १ | ६ | २७ |
| प्राण इति प्राणविदः | २ | २० | ८७ |
| प्राणादिभिरनन्तैश्च | २ | १९ | ८६ |
| प्राप्य सर्वज्ञतां कृत्स्नाम् | ४ | ८५ | २५३ |
| फलादुत्पद्यमानः सन् | ४ | १७ | १९३ |
| बहिःप्रज्ञो विभुर्विश्वः | १ | १ | १९ |
| बीजाङ्कुरसमो दृष्टान्तः | ४ | २० | १९६ |
| बुद्ध्वा निमित्ततां सत्याम् | ४ | ७८ | २४८ |
| भावैरसद्भिरेवायम् | २ | ३३ | १०० |
| भूतं न जायते किञ्चित् | ४ | ४ | १८२ |
| भूतोऽभूतो वापि | ३ | २३ | १४४ |
| भूतस्य जातिमिच्छन्ति | ४ | ३ | १८१ |
| भोगार्थं सृष्टिरित्यन्ये | १ | ९ | ३१ |
| मकारभावे प्राज्ञस्य | १ | २१ | ५९ |
| मन इति मनोविदः | २ | २५ | ८९ |
| मनसो निग्रहायत्तम् | ३ | ४० | १६८ |
| मनोदृश्यमिदं द्वैतम् | ३ | ३१ | १५५ |
| मरणे सम्भवे चैव | ३ | ९ | १२४ |
| मायया भिद्यते ह्येतत् | ३ | १९ | १३९ |
| मित्राद्यैः सह संमन्त्र्य | ४ | ३५ | २१३ |
| मृल्लोहविस्फुलिङ्गाद्यैः | ३ | १५ | १३२ |
| यं भावं दर्शयेच्चेत्यः | २ | २९ | ९० |
| यथा निर्मितको जीवः | ४ | ७० | २४१ |
| यथा भवति बालानाम् | ३ | ८ | १२२ |
| यथा मायामयाद्बीजात् | ४ | ५९ | २३५ |
| यथा मायामयो जीवः | ४ | ६९ | २४१ |