माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| १६ | मांडूक्योपनिषद् | [ गौ० कां० | | :--- | :--- |
| स्वप्नदर्शनं कामो वा क्वचन विद्यते। तदेतत्सुषुप्तं स्थानमस्येति सुषुप्तस्थानः। | अथवा किसी प्रकारकी कामना नहीं होती, वह यह सुषुप्त अवस्था ही जिसका स्थान है उसे सुषुप्तस्थान कहते हैं । |
| स्थानद्वयप्रविभक्तं मनःस्पन्दितं द्वैतजातं तथारूपापरित्यागेनाविवेकापन्नं नैशतमोग्रस्तमिवाहः सप्रपञ्चमेकीभूतमित्युच्यते। | जिस प्रकार रात्रिके अन्धकारसे दिन आच्छादित हो जाता है उसी प्रकार पूर्वोक्त दोनों स्थानोंमें विभिन्न रूपसे प्रतीत होनेवाला मनका स्फुरणरूप द्वैतसमूह [इस अवस्थामें] प्रपञ्चके सहित अपने उस (विशिष्ट) स्वरूपका त्याग न कर अज्ञानसे आच्छादित |
| अत एव स्वप्नजाग्रन्मनःस्पन्दनानि प्रज्ञानानि घनीभूतानीव सेयमवस्थाविवेकरूपत्वात्प्रज्ञानघन उच्यते । यथा रात्रौ नैशेन तमसाविभज्यमानं सर्वं घनमिव तद्वत्प्रज्ञानघन एव । एवशब्दान्न जात्यन्तरं प्रज्ञानव्यतिरेकेणास्तीत्यर्थः । | हो जाता है; इसलिये इसे 'एकीभूत' ऐसा कहा जाता है । अतः जिस अवस्थामें स्वप्न और जाग्रत्—ये मनके स्फुरणरूप प्रज्ञान घनीभूतसे हो जाते हैं, वह यह अवस्था अविवेकरूपा होनेके कारण प्रज्ञानघन कही जाती है । जिस प्रकार रात्रिमें रात्रिके अन्धकारसे पृथक्त्वकी प्रतीति न होनेके कारण सम्पूर्ण प्रपञ्च घनीभूत-सा जान पड़ता है उसी प्रकार यह प्रज्ञानघन ही है । 'एव' शब्दसे यह तात्पर्य है कि उस समय प्रज्ञानके सिवा कोई अन्य जाति नहीं रहती । |
| मनसो विषयविषय्याकारस्पन्दनायासदुःखाभावादानन्दमय आनन्दप्रायो नानन्द एव । | मनका जो विषय और विषयीरूपसे स्फुरित होनेके आयासका दुःख है उसका अभाव होनेके कारण यह आनन्दमय अर्थात् आनन्दबहुल है; केवल आनन्दमात्र |