भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

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पृष्ठ 46
२६माण्डूक्योपनिषद्[ गौ० का०
वाच्यस्य तुरीयत्वेन देहादिसंबन्ध-जाग्रदादिरहितां पारमार्थिकीं पृथग्वक्ष्यति । बीजावस्थापि न किंचिदवेदिषमित्युत्थितस्य प्रत्ययदर्शनाद्देहेऽनुभूयत एवेति त्रिधा देहे व्यवस्थित इत्युच्यते ॥२॥उस पारमार्थिकी अबीजावस्थाका तुरीयरूपसे अलग वर्णन करेंगे। बीजावस्था भी जाग्रत् होनेपर 'मुझे कुछ भी पता नहीं रहा' ऐसी प्रतीति देखनेसे शरीरमें अनुभव होती ही है। इसीसे 'वह देहमें तीन प्रकारसे स्थित है' ऐसा कहा गया है ॥२॥

विश्वादिका त्रिविध भोग

विश्वो हि स्थूलभुङ्नित्यं तैजसः प्रविविक्तभुक् ।
आनन्दभुक्तथा प्राज्ञस्त्रिधा भोगं निबोधत ॥ ३ ॥

विश्व सर्वदा स्थूल पदार्थोंको ही भोगनेवाला है, तैजस सूक्ष्म पदार्थोंका भोक्ता है तथा प्राज्ञ आनन्दको भोगनेवाला है; इस प्रकार इनका तीन तरहका भोग जानो ॥३॥

स्थूलं तर्पयते विश्वं प्रविविक्तं तु तैजसम् ।
आनन्दश्च तथा प्राज्ञं त्रिधा तृप्तिं निबोधत ॥ ४ ॥

स्थूल पदार्थ विश्वको तृप्त करता है, सूक्ष्म तैजसकी तृप्ति करनेवाला है तथा आनन्द प्राज्ञकी; इस प्रकार इनकी तृप्ति भी तीन तरहकी समझो ॥४॥

उक्तार्थौ श्लोकौ ॥ ३-४ ॥इन दोनों श्लोकोंका अर्थ कहा जा चुका है ॥ ३-४ ॥

त्रिविध भोक्ता और भोग्यके ज्ञानका फल

त्रिषु धामसु यद्भोज्यं भोक्ता यश्च प्रकीर्तितः ।
वेदैतदुभयं यस्तु स भुञ्जानो न लिप्यते ॥ ५ ॥