माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
DevanagariHindipublished301 पृष्ठ
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| ३२ | माण्डूक्योपनिषद् | [ गौ० का० |
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| भोगार्थं क्रीडार्थमिति चान्ये सृष्टिं मन्यन्ते । अनयोः पक्षयो- र्दूषणं देवस्यैष स्वभावोऽयमिति देवस्य स्वभावपक्षमाश्रित्य, सर्वेषां वा पक्षाणामाप्तकामस्य का स्पृहेति । न हि रज्ज्वादीनामविद्यास्वभाव-व्यतिरेकेण सर्पाद्याभासत्वे कारणं शक्यं वक्तुम् ॥९॥ | दूसरे लोग सृष्टिको 'यह भोगार्थ अथवा क्रीडार्थ है'—ऐसा मानते हैं। 'देवस्यैष स्वभावोऽयम्' इस वाक्यसे देवके स्वभावपक्षका आश्रय लेकर इन दोनों पक्षोंको दोषयुक्त बतलाते हैं। अथवा 'आप्तकामस्य का स्पृहा' यह चौथा पाद सभी पक्षोंको दोष-युक्त बतलानेवाला है; क्योंकि अविद्यारूप अपने स्वभावके विना रज्जु आदिका सर्पादिको अभिव्यक्ति-में कारणत्व नहीं बतलाया जा सकता ॥ ९॥ |
चतुर्थ पादका विवरण
| चतुर्थः पादः क्रमप्राप्तो वक्तव्य इत्याह—नान्तःप्रज्ञमित्यादिना । सर्वशब्दप्रवृत्तिनिमित्तशून्यत्वा-त्तस्य शब्दानभिधेयत्वमिति विशेषप्रतिषेधेनैव च तुरीयं निर्दिदिक्षति । | अब क्रमसे प्राप्त हुआ चौथा पाद भी बतलाना है, अतः यही बात 'नान्तःप्रज्ञम्' इत्यादि मन्त्रसे कहते हैं। वह (चौथा पाद) सम्पूर्ण शब्दप्रवृत्तिके निमित्तसे रहित है, अतः शब्दसे उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। इसलिये श्रुति [अन्तःप्रज्ञत्व आदि] विशेष भावका प्रतिषेध करके ही उस तुरीयका निर्देश करनेमें प्रवृत्त होती है। |
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| शून्यमेव तर्हि तत् । | **पूर्व०—**तब तो वह शून्यरूप ही हुआ। |
| न; मिथ्याविकल्पस्य | **सिद्धान्ती—**नहीं; क्योंकि मिथ्या- |