भारतकोश
माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

Mandukya Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished301 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 301 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 95

शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७५


अपूर्व्वं स्वप्ने पश्यतिः चतुर्दन्त-स्वप्नमें तो यह अपूर्व वस्तुएँ
गजमारूढमष्टभुजमात्मानं मन्यते।देखता है । अपनेको चार दाँतोंवाले
हाथीपर चढ़ा हुआ तथा आठ
अन्यदप्येवंप्रकारमपूर्व्वं पश्यतिभुजाओंवाला मानता है । इसी प्रकार
स्वप्नमें और भी अपूर्व वस्तुएँ देखा
स्वप्ने । तन्नान्येनासता सममितिकरता है । वे किसी अन्य असत्
सदेव । अतो दृष्टान्तोऽसिद्धः।वस्तुके समान नहीं होतीं; इसलिये वे
सत् ही हैं। अतः यह दृष्टान्त सिद्ध
तस्मात्स्वप्नवज्जागरितस्यासत्त्वसि-नहीं हो सकता । अतः स्वप्नके समान
द्ध्ययुक्तम् ।जागरितकी भी असत्यता है—यह
कथन ठीक नहीं ।
तन्न; स्वप्ने दृष्टमपूर्व्वंऐसी बात नहीं है । स्वप्नमें देखी
यन्मन्यसे न तत्स्वतः सिद्धम् ।हुई जिन वस्तुओंको अपूर्व समझता है
किं तर्हि ?वे स्वतःसिद्ध नहीं हैं । तो कैसी हैं ?

अपूर्व्वं स्थानिधर्मो हि यथा स्वर्गनिवासिनाम् ।
तानयं प्रेक्षते गत्वा यथैवेह सुशिक्षितः ॥ ८ ॥

जिस प्रकार [ इन्द्रादि ] स्वर्गनिवासियोंकी [ सहस्रनेत्रत्वादि ] अलौकिक अवस्थाएँ सुनी जाती हैं उसी प्रकार यह (स्वप्न) भी स्थानी (स्वप्नद्रष्टा आत्मा) का अपूर्व धर्म है । उन स्वाप्न पदार्थोंको यह इसी प्रकार जाकर देखता है जैसे कि इस लोकमें [ किसी मार्गविशेषके सम्बन्धमें ] सुशिक्षित पुरुष [ उस मार्गसे जाकर अपने अभीष्ट लक्ष्यपर पहुँचकर उसे देखता है ] ॥ ८ ॥

अपूर्व्वं स्थानिधर्मो हि स्थानिनोवे स्थानीका अपूर्व धर्म ही हैं; स्थानी
द्रष्टुरेव हि स्वप्नस्थानवतोअर्थात् स्वप्नस्थानवाले द्रष्टाका ही धर्म
धर्मः । यथा स्वर्गनिवासि-हैं। जैसे कि स्वर्गनिवासी इन्द्रादिके
नामिन्द्रादीनां सहस्राक्षत्वादिसहस्राक्षत्वादि धर्म हैं उसी प्रकार