माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)

माण्डूक्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य व गौड़पादकारिका सहित)
Mandukya Upanishad Shankara Bhashya
आदि शङ्कराचार्य / गौड़पादाचार्य द्वारा
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शां० भा० ] वैतथ्यप्रकरण ७५
| अपूर्व्वं स्वप्ने पश्यतिः चतुर्दन्त- | स्वप्नमें तो यह अपूर्व वस्तुएँ |
| गजमारूढमष्टभुजमात्मानं मन्यते। | देखता है । अपनेको चार दाँतोंवाले |
| हाथीपर चढ़ा हुआ तथा आठ | |
| अन्यदप्येवंप्रकारमपूर्व्वं पश्यति | भुजाओंवाला मानता है । इसी प्रकार |
| स्वप्नमें और भी अपूर्व वस्तुएँ देखा | |
| स्वप्ने । तन्नान्येनासता सममिति | करता है । वे किसी अन्य असत् |
| सदेव । अतो दृष्टान्तोऽसिद्धः। | वस्तुके समान नहीं होतीं; इसलिये वे |
| सत् ही हैं। अतः यह दृष्टान्त सिद्ध | |
| तस्मात्स्वप्नवज्जागरितस्यासत्त्वसि- | नहीं हो सकता । अतः स्वप्नके समान |
| द्ध्ययुक्तम् । | जागरितकी भी असत्यता है—यह |
| कथन ठीक नहीं । | |
| तन्न; स्वप्ने दृष्टमपूर्व्वं | ऐसी बात नहीं है । स्वप्नमें देखी |
| यन्मन्यसे न तत्स्वतः सिद्धम् । | हुई जिन वस्तुओंको अपूर्व समझता है |
| किं तर्हि ? | वे स्वतःसिद्ध नहीं हैं । तो कैसी हैं ? |
अपूर्व्वं स्थानिधर्मो हि यथा स्वर्गनिवासिनाम् ।
तानयं प्रेक्षते गत्वा यथैवेह सुशिक्षितः ॥ ८ ॥
जिस प्रकार [ इन्द्रादि ] स्वर्गनिवासियोंकी [ सहस्रनेत्रत्वादि ] अलौकिक अवस्थाएँ सुनी जाती हैं उसी प्रकार यह (स्वप्न) भी स्थानी (स्वप्नद्रष्टा आत्मा) का अपूर्व धर्म है । उन स्वाप्न पदार्थोंको यह इसी प्रकार जाकर देखता है जैसे कि इस लोकमें [ किसी मार्गविशेषके सम्बन्धमें ] सुशिक्षित पुरुष [ उस मार्गसे जाकर अपने अभीष्ट लक्ष्यपर पहुँचकर उसे देखता है ] ॥ ८ ॥
| अपूर्व्वं स्थानिधर्मो हि स्थानिनो | वे स्थानीका अपूर्व धर्म ही हैं; स्थानी |
| द्रष्टुरेव हि स्वप्नस्थानवतो | अर्थात् स्वप्नस्थानवाले द्रष्टाका ही धर्म |
| धर्मः । यथा स्वर्गनिवासि- | हैं। जैसे कि स्वर्गनिवासी इन्द्रादिके |
| नामिन्द्रादीनां सहस्राक्षत्वादि | सहस्राक्षत्वादि धर्म हैं उसी प्रकार |