भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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साखियाँ और सब्द


साखियाँ

मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई ।
हे हंसा तू अमर-लोक का, पड़ा काल बस आई ॥

जीवात्मा को सम्बोधित करते हुए साहिब कह रहे हैं कि हे जीवात्मा ! यह मन ही निरंजन है, जो तुम्हें युगों-2 से भ्रमित कर रहा है। तू तो अमर-लोक का जीव है, वहाँ रहने वाला है, लेकिन काल-पुरुष (मन) के वश में तू आ गया है।

मन ही सरूपी देव निरंजन, तोहि रहा भरमाई ।
पाँच पसीच तीन का पिंजड़ा, जामें तोहि राखा भरमाई ॥

साहिब स्पष्ट कह रहे हैं कि मन, जिसे निरंजन भी कहा जाता है, निराकार भी कहा जाता है, तुम्हें युगों-युगों से भटका रहा है। यह शरीर तो पिंजड़ा है, जिसमें निर्मल आत्मा को कैद कर दिया है, उसने।

अलख निरंजन लखे न कोई, जिहि बंधे बंधा सब लेई ।
जेहि झूठे सब बंधु अयाना, झूठी बात साँच कै माना ॥

साहिब कह रहे हैं कि अलख निरंजन, जिसे कोई देख नहीं पाता, ही संसार के समस्त प्राणियों को बाँधे हुए है। अज्ञानी लोग उसकी झूठी माया को सच मानकर उसके बंधन में स्वयं ही बँध गये हैं। इस प्रकार सारा संसार भ्रम में पड़ा हुआ है, दही के स्थान पर पानी का मंथन किये जा रहा है। जिस तरह चकोर अंगार को ही चन्द्रमा मानकर उसे मुँह