भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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पता है कि मन अर्थात् काल रूपी शिकारी ने ही यहाँ पर सुखों के जाल बिछाकर रखे हैं।

मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक।
जो मन पर असवार है, सो साधू कोई एक ॥

मन के कहे अनुसार कोई भी कार्य न करो, क्योंकि इस मन का कोई एक मत नहीं है। कभी यह मन कुछ कहता है, कभी कुछ। इसके अनेक मत हैं। लेकिन हमेशा ही यह मन शरीर के सुखों के अनुसार काम करने को ही कहता है। कभी भी यह मन आत्मा के कल्याण के लिए कोई काम करने को नहीं कहता। जो मन की आज्ञा का पालन न करते हुए मन को अपनी आज्ञानुसार चलाता है, ऐसा कोई बिरला ही साधू होता है।

सुर नर मुनि सबको ठगा, मनहिं लिया औतार।
जो कोई याते बचै, तीन लोक से न्यार ॥

साहिब कह रहे हैं कि इस मन ने सुर, नर, मुनि सबको ठगा है। यही मन संसार में अवतार धारण करके आता है। जो इससे बच जाए, वो इसके तीन लोक से छूटकर न्यारा हो जाता है।

कबीर मन तो एक है, भावै तहाँ लगाय।
भावै गुरु की भक्ति कर, भावै विषय कमाय ॥

साहिब कह रहे हैं कि यह मन तो एक है, एक ही जगह लगेगा। अब तो तेरी, इच्छा पर है। यदि तू चाहे तो इसे विषय विचारों में उलझा दे या फिर इसे गुरु चरणों में लगाकर गुरु की भक्ति कर।

मन के हारे हार हैं, मन के जीते जीत।
कहैं कबीर गुरु पाइपे, मन ही के परतीत ॥

साहिब कह रहे हैं कि हम मन से हार मान लें तो हम हार जाते हैं और यदि हम मन से जीतने का विश्वास बना लें तो हम जीत भी सकते हैं। इसी तरह सच्चे प्रेम से भरोसा करने पर हम गुरु को भी पा सकते हैं