मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंरहा है। जीव जगह-जगह बचने के लिए भाग रहे हैं, भटक रहे हैं, पर काल के द्वार पर ही माथा पटक रहे हैं, वहीं अटक रहे हैं। कोई सिद्धि शक्तियों को देख भ्रमित हो रहा है, कोई किसी साधु की करामात देखकर भ्रमित हो रहा है। ये सब निरंजन के ही जाल हैं, जो जीव को अमर-लोक के सच्चे साहिब के द्वार पर नहीं जाने देते हैं। परम-पुरुष की सेवा करके इस निरंजन ने उनसे तीन लोक में राज्य करने का वर माँग लिया है। यह स्वयं विषयों का आनन्द लेता है और फिर उनका कष्ट जीवों को देकर उन्हें खा जाता है। ब्रह्मा, विष्णु और महादेव भी उसकी इस चाल को नहीं समझते हैं। इन त्रिदेव से निरंजन न्यारा है और निरंजन से भी परम-पुरुष न्यारा है। यदि इस कठिन काल निरंजन से बचना चाहते हो तो सद्गुरु के सार-शब्द को पकड़े रहो। क्योंकि फिर वो हमारा हंस हो जाता है और दुबारा काल के इस संसार में नहीं आता।
साधो यह मन है बड़ा जालिम
साधो यह मन है बड़ा जालिम।
जा को मन से काम परो है, तिसही है है मालूम॥
मन कारन जो उनको छाया, तेहि छाया में अटकै।
निरगुन सरगुन मन की बाजी, खरे सयाने अटकै॥
मन ही चौदह लोक बनाया, पाँच तत्त्व गुन कीन्है।
तीन लोक जीवन बस कीन्है, परै न काहू चीन्है।
जो कोउ कहै हम मन को मारा, जाके रूप न रेखा।
छिन छिन में कितनौ रंग ल्यावै, जे सपनेहु नहिं देखा॥
रसातल इकइस ब्रह्मण्डा, सब पर अदल चलावै।
षट रस में भोगी मन राजा, सो कैसे के पावै॥
सब के ऊपर नाम निअच्छर, तहैं लै मन को राखै।
तब मन की गति जान परै यह, सत कबीर मुख भाखै॥