भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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व्यवहार में नाशवान् मान रहे हैं, क्योंकि हम शरीर से बहुत प्यार कर रहे हैं, जितने भी कार्य हैं, सब इसी की सुख-सुविधा के लिए कर रहे हैं। दूसरी ओर आत्मा के कल्याण के लिए, आत्मा को बंधन से छुड़ाने के लिए हम कोई भी कार्य नहीं कर रहे हैं।

‘आत्मा अमर है’ जानकर भी हम आत्मा का व्यवहार नहीं कर पाते हैं और शरीर को भी व्यवहार में नाशवान् नहीं समझते हैं। आखिर क्यों ? संत कहा करते हैं कि वेद-शास्त्रों या अन्य-अन्य धार्मिक पुस्तकों का हम कितना ही अध्ययन क्यों न कर लें; लेकिन जब तक हम यथार्थ में अपनी आत्मा से परिचित न हो जाएँ, उसे देख न लें; हम अपने को शरीर से परे एक आत्मा मानकर व्यवहार नहीं कर सकते। वर्तमान में हम अपने को आत्मा न समझकर एक शरीर ही मान रहे हैं। आत्मा को ज्ञान है कि वो अमर है, इसलिए आत्मा अपनी अमरता की प्रवृत्ति के कारण ही शरीर में बैठकर उसे भी अमर मान रही है, सत्य मान रही है, नित्य मान रही है, जो कि वास्तव में नाशवान् है, अनित्य है, झूठ है।

मन का दूसरा रूप है—बुद्धि। जब भी मन कोई फैसला करता है तो इसी मन को बुद्धि कहा जाता है। वह बैरी है, वो मित्र है, यह काम करना है, वो काम नहीं करना है आदि कार्य बुद्धि करती है। बुद्धि के भी सारे फैसले, सारे निर्णय शरीर के विषय में होते हैं। आत्मा के विषय में तो इसे सोचने का समय ही नहीं। महापुरुषों के सत्संग से प्रभावित होकर ही हम थोड़ी देर आत्मा के विषय में सोच पाते हैं। ऐसा तभी सम्भव हो पाता है, जब महापुरुषों की अलौकिक वाणी हमारी आत्मा को छू जाती है और फिर हम विचारों में खो जाते हैं। विचार आत्मा का गुण है। पर थोड़ी देर बाद पुनः मन की दुनिया में रम जाते हैं।

मन का तीसरा रूप है—चित्त। चित्त का काम है—याद करना। यह चित्त भी आत्मा के कल्याण के लिए कभी आगे नहीं आने वाला, प्रभु को याद नहीं करने वाला। कभी-कभी हम पुरानी बातों को याद करते हैं कि उसने मेरे साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया था। फिर कभी-कभी