मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतब रति देख दीन है गयऊ। विनती करत विषय तन भयऊ॥
जब रति देखि दीन है आई। विनती करी तब लिखि पाई॥
सृष्टि न होय न चलै संसारा। महा रुद्र तुम करहु विचारा॥
जब शिव देख दया मन लावा। ता दुख मेटन मन में आवा॥
तब तिय जानि बहुरि निर्मयऊ। अंगहीन सो अति बलि भयऊ॥
शिव महापुराण में भी कथा आती है। तो—
बहुरि काम चले समुहाई। तेतिस क्रोड किये वशि जाई॥
काम बान शर धरि लीन्हा। जीतन चले सो आपु वशि कीन्हा॥
इंद्रसेन जब गयी सब हारी। इंद्रहु की गई बुद्धि मति मारी॥
जबहिं इंद्र काम वश भयऊ। गौतम नारि छलन तब गयऊ॥
जबते चित में चितये पापू। सहे उग्र गौतम का शापू॥
सहस्त्र भग ताकहैं भयऊ। काम बान कर फल यह ठयऊ॥
काम चंद्र पर चितवे जबहीं। जाइ हरे गुरुपत्नी तबहीं॥
इस काम ने तैर्तीस करोड़ देवताओं को भी अपने वश में किया हुआ है। उनके राजा को ही लेते हैं। राक्षसों से युद्ध में हार जाने पर इंद्र का दिमाग खराब हो गया और वो गौतम की पत्नी अहिल्या के पास पहुँच गया। देखा न, देवताओं के राजा का यह हाल हो गया! फिर आम आदमी की क्या बात करें! आदमी क्या, अन्य देवताओं की बात भी क्या की जाए! देवताओं के राजा का यह हाल हो गया। कोई अच्छा हो तो कहते हैं कि देवता समान है। अब देवताओं के राजा का यह हाल है कि पराई स्त्री के पास पहुँच गया तो क्या कहा जाए! गौतम ऋषि ने शाप दे दिया, कहा कि जाओ, सहस्त्र भग हो जाएँ शरीर में। उसके शरीर में हजार भग द्वार हो गये, मुँह में, टाँगों में..... सब जगह। जब चंद्रमा पर काम की नज़र पड़ गयी तो वो गुरु-पत्नी के पास पहुँच गया। साहिब कह रहे हैं—
ऐसो असुर घट मों बसे, सुनहु हो धर्मदास॥
घट परिचय जाने बिना, सबका भया विनाश॥