भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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ततछन कन्या कीन्ह पुकारा। काल निरंजन कीन्ह अहारा॥

जैसे ही निरंजन ने उसे निगला, उसने परम पुरुष को पुकार की, कहा कि काल निरंजन ने मुझे खा लिया है।

तबही धर्म सहज लग आई। सहज शून्य तब लीन्ह छुड़ाई॥

फिर निरंजन सहज के पास गया और उसे भी वहाँ से भगा दिया, क्योंकि तप के कारण उसमें ताकत आ गयी थी।

पुरुष ध्यान कूर्म अनुसार। मोसन काल कीन्ह अधिकारा॥

तीन शीश मम भच्छन कीन्हो। हो सतपुरुष दया भल चीन्हो॥

यही चरित्र पुरुष भल जानी। दीन्हो शाप सो कहों बखानी॥

लच्छ जीव नित ग्रासन करहू। सवा लच्छ नित प्रति बिस्तरहू॥

परम पुरुष को ध्यान आया कि इसने पहले भी कूर्म का पेट फाड़कर पाँच तत्व का बीज निकाला था और अब इसने आदि-शक्ति को निगल लिया है। परम पुरुष को बुरा लगा, उन्होंने निरंजन को शाप दे दिया, कहा कि एक लाख जीवों को तू रोज निगलेगा तो भी तेरा पेट नहीं भरेगा और सवा लाख को उत्पन्न करेगा।

पुनि कीन्ह पुरुष तिवान, तिहि छन मेटि डारो काल हो।

कठिन काल कराल जीवन, बहुत करइ बिहाल हो।

यहि मेटत सबै मिटिहैं, बचन डोल अडोलसां॥

परम पुरुष ने विचार किया कि मैं काल पुरुष को मिटा देता हूँ, क्योंकि यह तो जीवों को बड़ा कष्ट देगा, पर फिर ध्यान आया कि मैंने तो इसे 17 असंख्य चौकड़ी युग का राज्य दिया है, यदि मिटा दिया तो एक तो मेरा शब्द कट जायेगा और फिर सभी 16 पुत्रों को एक नाल में पियेगा है, यदि एक को भी मिटाया तो सभी मिट जायेंगे।

डोलै वचन हमार, जो अब मेटा धरम को।

वचन करो प्रतिपाल, देश मोर अब ना लहैं॥

उसे मिटाने से शब्द कट जाता था, इसलिए शाप दिया कि अब