मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 62, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंउदर फारि अब आवहु बाहर। पुरुष तेज सुमिरो तोहि ठाहर॥
योगजीत ने कहा कि तुमने आद्य-शक्ति को निगल लिया है, परम पुरुष की आज्ञा से मैं यहाँ आया हूँ, तुम्हें यहाँ से निकालना है। तब योगजीत ने कन्या से कहा कि इसके पेट में क्यों बैठी हो, परम पुरुष की सुरति करके इसका पेट फाड़कर बाहर आ जाओ।
सुनिके धर्म क्रोध उर जरेऊ। जोगजीत सो सन्मुख भिरेऊ॥
जोगजीत तब कीन्हे ध्याना। पुरुष प्रताप तेज उर आना॥
पुरुष आज्ञा भई तेहि काला। मारहु सुरति लिलार कराला॥
जोगजीत पुनि तैसो कीन्हा। जस आज्ञा पुरुष तेहि दीन्हा॥
यह सुन निरंजन क्रोधित होकर लड़ने के लिए योगजीत के सम्मुख आया। योगजीत ने तब परम-पुरुष का ध्यान करके उनके तेज को लिया और निरंजन पर सुरति फेंकी, जिससे वो बेहोश होकर गिर पड़ा।
गहि भुजा फटकार दीन्हों, परेउ लोक से न्यार हो॥
भयो त्रासित पुरुष डरते, बहुरि उठेउ सम्हार हो॥
निरसि कन्या उदर ते, पुनि देख धर्महि अति डरी॥
अब नहिं देखों देस वह, कहो कौन विधि कहँवा परी॥
तब योगजीत ने उसकी भुजा पकड़कर उसे अमर लोक से नीचे शून्य में फेंक दिया। वहाँ योगजीत के डर से संभलकर उठा और उसके पेट से कन्या बाहर निकल आई। निरंजन को देख कन्या डरने लगी और सोचने लगी कि यहाँ कैसे आ गयी। अब उस देश में नहीं जा पाऊँगी।
कामिनी रही सकाय, त्रासित काल डर अधिका।
रही सो सीस नवाय, आस पास चितवत खड़ी॥
आद्य-शक्ति काल निरंजन से डरने लगी और शीश नवाकर वहाँ पास में खड़ी हो गयी।