मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 78, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंआज्ञा मानि चले तब, आये युधिष्ठिर राय ॥
तब कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को कहा कि तुम जाओ । उनकी आज्ञा सुनकर राजा युधिष्ठिर सुपच को बुलाने चल पड़ा ।
अहो संत तजिये अपराधा । अधम उधारन सुनियत साधा ॥
चलो स्वामी मेरे गृह आजू । कृपा करौ मम होवै काजू ॥
कहैं सुपच सुन पांडव राऊ । तोर का काज होय वहि ठाऊ ॥
तुम्हरे गये होय मम काजा । परमारथ तुम को बड़ साजा ॥
चल परमारथ कारण संता । सभा माहिं बैठ हरषंता ॥
आवत श्वपच कृष्ण जब जाना । होय काय पूर्ण सनमाना ॥
राय युधिष्ठिर पखारे पाऊँ । भोजन सादर आन जिवाऊँ ॥
भोजन करके सुपच भयो ठाढा । बाज्यो घंट शब्द भयो गाढा ॥
बाज्यो घंट यज्ञ भयो पूरा । कौतुक देखि ऋषीगण भूला ॥
पूर्ण यज्ञ कृष्ण जब जाना । तबही कीन्ह द्वारिका पयाना ॥
युधिष्ठिर ने वहाँ जाकर सुपच से कहा कि हे संत, अपराध को क्षमा करें और कृपा करके मेरे घर चलें, जिससे मेरा कल्याण हो । सुपच ने पूछा कि हे पाण्डव राजा, तुम्हारा वहाँ क्या काम है ? युधिष्ठिर ने कहा कि आप परमार्थी हैं, इसलिए मुझे विश्वास है कि आप मेरे काम के लिए चलेंगे । युधिष्ठिर की विनती सुन सुपच उनके साथ वहाँ आए तो राजा युधिष्ठिर ने उनके पाँव पखारे और आदर सहित भोजन के लिए बिठाया । भोजन करके सुपच जैसे ही खड़े हुए तो घंटा बजा और यज्ञ पूर्ण हुआ । कृष्ण जी ने यज्ञ पूर्ण जान तब द्वारिका को प्रस्थान किया ।
बूझो रे नर परानी, क्या सुपचै अधिकार ॥
गण गंधर्व मुनि देव ऋषि, सब मिलि कीन्ह अहार ॥
हे मनुष्य, समझ, आखिर सुपच में क्या खास था कि गण, गंधर्व, मुनि, देवता, ऋषि सबके भोजन खाने से जो घंटा नहीं बज सका, वो सुपच के खाने से ही बजा ।
सब के खाये घंट नहिं बाजा । धर्म की देह युधिष्ठिर राजा ॥