भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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तीन लोक के कृष्ण भुवारा । रहै न बैर जीव व्यवहारा ॥
जो जीवल आप स्वार्थहि मारा । सो जीव अपनो किमि निस्तारा ॥
तबहि कृष्ण अस मता विचारा । तत्व मता अस रूप संहारा ॥
जादव रूप कृष्ण सब मारे । पारथ बान रहे सब हारे ॥
गोपी रही जो प्राणहि प्यारी । तिनको कृष्ण येहि विधि मारी ॥
आये कृष्ण पहुँ अर्जुन बीरा । लाज न छाड़ै अत्र शरीरा ॥

तो इस तरह त्रेतायुग के बालि ने, जो द्वापर में बदला लेने के लिए व्याध का जन्म लिए हुए था, कृष्ण जी को तीर मारकर बदला ले लिया। यादव, गोपियों आदि सब मारे गये।

कहैं कृष्ण सुन अर्जुन, छाड़ो यहि संसार ॥
हम तो जात हैं स्वर्ग को, इत परपंच अपार ॥

कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा कि मैं अब स्वर्ग में जा रहा हूँ, यह संसार झंझट है, इसे छोड़ो।

गये पारथ जहाँ चारों भाई। चलौ वही जहाँ यादो राई ॥
कहै संदेश सुनो हो राऊ। यहाँवा मोर दरश नहीं पाऊ ॥
मृत मंडल नहीं मेटव मोही। छाड़ो महि बोलों अस तोही ॥
छाड़ो राज पाट सब भाई। पुत्र राज देऊ सब जाई ॥
चारेऊ पांडव काल वश भयेऊ। राय युधिष्ठिर सदेह तब गयेऊ ॥
ता कहैं बड़ शासन जो कीन्हा। नाम बिना देखो अस चीन्हा ॥
देखत कृष्ण अपन तन त्यागा। चिता तासु की रचन जो लागा ॥
चन्दन काष्ठ तासु तन जारा। चल भयो काष्ठ समुद्र मझारा ॥
इंद्र देवन हरि सपना दयेऊ। तिन पुनि काष्ठ आन धरि लयेऊ ॥
मूंधायो द्वार काहु नहीं जाना। ठक ठक उठै दिन रात प्रवीना ॥
शिशुपाल भुजा चार रहो जाही। मार्यो कृष्ण जो भक्ष्यो ताही ॥

राज्य का भार पुत्रों को सौंपकर पाँचों पाण्डव वहाँ चले, जहाँ कृष्ण थे। चार पाण्डव तो रास्ते में ही दम तोड़ गये, केवल युधिष्ठिर ही सहेद वहाँ तक पहुँच सके। कृष्ण जी ने अपना शरीर भी त्याग दिया और शिशुपाल की भुजा उखाड़ी थी, सो उसे भी बदला दिया।

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