भारतकोश
मनहिं निरंजन सबै नचाए

मनहिं निरंजन सबै नचाए

Manhin Niranjan Sabai Nachaye

सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा

स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)

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सवारी। 'मन पर जो असवार है, ऐसा बिरला कोय।' मन को चारों स्वरूपों पर नियंत्रण होगा, उस पर अधिकार होगा। सोचें कि कितना महान हो गया। बड़े-2 तपस्वी भी मन की वृत्तियों पर नियंत्रण नहीं कर पाए। तभी तो मीरा कह रही है—'सखी री मैं तो नाम रतन धन पायो।' आत्मा का ठिकाना बताता हूँ। मन समझने लगता है। मन से तो भी होशियार रहना। अंतिम बिंदु तक इसकी चेष्टा रहती है कि मारूँ। जब भी लगे कि इसके बिना नहीं रह सकता हूँ तो यह सम्मोहन है। किसी पदार्थ के बिना नहीं जी सकते तो सम्मोहन है। मन के पास वेग है। गुरु ताकृत देता है तो मन पर नियंत्रण होने लग जाता है। 24 घण्टे मन के हमले हो रहे हैं। 'चश्म दिल से देख तू, क्या-2 तमाशे हो रहे.....।' प्रहार आत्मा पर हो रहा है। यह प्रहार किये जा रहा है। बड़े-2 धुरंधरों ने दीर्ध साधनाएँ की, काया को गला डाला, घर छोड़ सन्यासी हो गये, पर पार नहीं पाया मन का।

कितने तपसी तप कर डारे, काया डारी गारा।

गूह छोड़ भये सन्यासी, तऊ ना पावत पारा॥

मन बहुत ही बलशाली है, तीन लोक मन का पिंजड़ा है। 'तीन लोक मैं मनहिं विराजी। तेहि ना चीन्हे पंडित काजी॥।' तीन लोक में मन विराजमान है। पर नाम के बाद मन शक्तिहीन हो जाता है। 'मन के चलाए तन चले....।' जिसका भी मन के चलाए तन चल रहा है, सर्वत्र नाश हो जायेगा। दीर्ध साधना के बाद भी मन नियंत्रण में नहीं आता। शृंगी ऋषि ने अपने शरीर को लकड़ी बना दिया था, सोचा कि खाऊँ गा नहीं तो रक्त नहीं बनेगा, रक्त नहीं होगा तो वीर्य नहीं बनेगा, वीर्य नहीं बनेगा तो विषय हो पायेगा। बाद में वेश्या से शादी कर बैठा था।

मन की संज्ञा ही परमात्मा है। सहस्र नाम मन के हैं। पर उस परम सत्ता को साहिब कहा, सतपुरुष कहा। वेदों में वर्णित है। बड़ी बारीकी में बैठा है मन। पर नाम के बाद मन की हरकतें समझ आने लगती हैं। क्रोध आकर नाड़ियों को चलायमान करता है तो पता चल

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