मनहिं निरंजन सबै नचाए
Manhin Niranjan Sabai Nachaye
सतगुरु मधु परमहंस जी द्वारा
स्रोत: साहिब बंदगी आध्यात्मिक संस्थान · साहिब बंदगी (उद्गम)
पृष्ठ 96, कुल 120 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यान में मन की बाधा
जब भी आप ध्यान में बैठते हैं तो एक चीज़ ध्यान देना कि मन कहाँ है आपका। मन को ठूँढना। ‘मनवाँ तो दश दिशि फिरे, यह तो सुमिरन नाही।’ इच्छा भी क्रिया है, याद भी क्रिया है, निश्चय भी क्रिया है, क्रिया भी क्रिया है। इच्छा करेंगे तो इन्हीं पदार्थों में ध्यान लगेगा। वैसे गुरु कृपा से सब होना है। इच्छा का निरोध करोगे तो मन निश्चय की तरफ लगता है। फैंसला भी क्रिया है। इसे रोकोगे तो याद दिलाएगा। यह भी क्रिया है। आटोमेटिक नहीं है। याद दिलाएगा कि फसल काटनी है। दराट ठूँढेंगे। यह क्रिया है। इसलिए ध्यान में बैठो तो चार तरह से मन क्रिया करेगा। कोई बात याद आए तो चिंतन नहीं करना। स्वाँसा को समझना। स्वाँस भी क्रिया है। छोड़ने के लिए, लेने के लिए भी आप शामिल हैं। यह भी एक क्रिया है। सभी पर कण्ट्रोल कर लेंगे तो साँस अड़चन है। जब तक यह नाभि दल में घूमती रहेगी तो एकाग्र नहीं हो पाओगे। इसको पलटकर ‘शून्य में देय समय।’ यह चंचल है। शून्य समाधि का अर्थ है, जब मन संकल्प नहीं कर रहा। चारों तरफ की क्रियाओं को समाप्त कर शून्य में समाने को कहा। इसकी ताकत गुरु देगा। बिना ताकत के मन पर नियंत्रण नहीं कर पाओगे। अपनी बुद्धि, विचार से मन पर नियंत्रण नहीं हो सकता है। गुरु नाम देता है तो ‘सहजे सहज पाइये’ वाली बात हो जाती है। बहुत आराम से चीज़ें मिल जाती हैं। मन पर सवारी हो जायेगी। ‘मन ही निरंजन सबै नचावे।’ पर आगे कह रहे हैं—‘नाम होय तो माथ नमावे।।’
मन घुमाता रहता है, चंचल है। उदास हो जाते हैं, तो भी मन का हमला है। मन ड्यूटी का पाबंद है। यह तीव्र साधक है। इसने 70 युग एक बार तपस्या की है, 70 युग दूसरी बार और 64 युग तीसरी बार। यह