मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें= मनुस्मृति । . इसी प्रकार ऐतरेयी, कौषीतकी, पैङ्गी आदि कितने एक शाखाभेद ग्रन्थान्तरों से और प्राप्त होते हैं । ऋग्वेदकी शाकल- संहिता और ऐतरेय तथा कौषीतक ये दो ब्राह्मणग्रन्थ उपलब्ध हैं। २। यजुर्वेद के शाखाभेद । यजुर्वेद कृष्ण और शुक्लभेद से दो प्रकार का है जिसका कारण आगे लिखा जायगा । यजुर्वेद की एकसौ एक शाखाएं थीं यह व्याकरण महाभाष्य के पहले आह्निक में लिखा है । कृष्णयजुर्वेद के बारह शाखाभेद प्राप्त होते हैं—चरक, आह्वरक, कठ, प्राच्य कठ, कापिष्ठलकठ, चारायणीय, वारतन्तवीय, श्वेत, श्वेततर, औपमन्यव, पात्यण्डिनेय और मैत्रायणीय । और मैत्रायणियों के छः शाखाभेद उपलब्ध होते हैं—मानव, वाराह, दुन्दुभ, छागलेय, हारिद्रवीय और श्यामायनीय । और चरकविशेष तैत्तिरीयों के दो शाखाभेद प्राप्त होते हैं— औखीय और खाण्डिकीय । खाण्डिकीयों के पांच शाखा- भेद मिलते हैं—आपस्तम्बी, बौधायनी, सत्याषाढ़ी, हिरण्य- केशी और शास्त्यायनी । कृष्णयजुर्वेद की कृष्ण-यजुःसंहिता, तैत्तिरीय-ब्राह्मण और तैत्तिरीय-आरण्यक सांप्रत में प्रचलित हैं । शुक्लयजुर्वेद के पंद्रह शाखाभेद हैं—काण्व, माध्यंदिन, जाबाल, बुधेय, शाकेय, तापनीय, कपोल, पौण्ड्र, वत्स, आवारिक, परमावारिक, पाराशरीय, बैनेय, वैधेय, औधेय और गालव । ये सब शाखा-प्रवर्तक वाजसनेय याज्ञवल्क्य के शिष्य होने के कारण वाजसनेयी कहलाते हैं । १ वाजसनेरपत्यं वाजसनेयः=वौजसनिका संतान वाजसनेय ।