मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । ६६ विष्णुने रामरूप से रामेश्वर ( लिङ्ग ) की स्थापना की तथा कृष्णरूप से पुत्रार्थ शिव की तपस्या की, ये बातें रामायण और भारत आदि में विख्यात हैं । और देखिये शिवकी दिव्यमूर्ति की यह महिमा लिखी है- ' तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरञ्चिर्हरिरधः परिच्छेत्तुं यातावन्नलमनलस्कन्धवपुषः । ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश य- त्स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥ १ ॥ और देखिये इतिहास-पुराणधुरन्धर रोमहर्षण ( सूत ) का नैमिषीय ऋषियों के प्रति यह वचन है- ' विष्णुर्विश्वजगन्नाथो विश्वेशस्य शिवस्य तु । आज्ञया परया युक्तो व्यासो जज्ञे गुरुर्मम ॥ ' ( सूतसंहिता माहात्म्यखण्डे १ अध्या० ४२ श्लो० ) इत्यादि अनेकानेक प्रमाणों से विशिष्टाद्वैतवाद के अनुसार विष्णु शिव के मूर्तिभेद मानने पर भी उनका परस्पर पूज्य-पूजक वा ध्यातृ-ध्येय भाव के निर्बाध होने से जगत् की एक स्वामिकता में विरोध नहीं है । और जो स्मृति-पुराण-महर्षियों को गुण विभाग से विभक्त मानते हैं, तथा विष्णु के अतिरिक्त शिवादि मोक्ष को नहीं दे सकते-इत्यादि गीत गाया करते हैं; वे सब बातें वास्तविक विचार से विरुद्ध हैं । यह मात्स्य वचन है- ' यस्मिन् कल्पे च यत्प्रोक्तं पुराणं ब्रह्मणा पुरा । तस्य तस्य च माहात्म्यं तत्स्वरूपेण वर्ण्यते ॥ अग्नेः शिवस्य माहात्म्यं तामसेषु प्रकीर्तितम् । राजसेषु च कल्पेषु माहात्म्यं ब्रह्मणो विदुः ॥