मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूमिका।
विष्णु में समन्वित किये गये हैं पर इन वाक्यों की सुप्रसिद्ध वर्णाश्रम व्यवस्थापक ग्रन्थों के साथ एकवाक्यता होनी असंभव है।
मन्वादि-शास्त्रानुसार कल्प ( ब्रह्मदिन ) कृत, त्रेता, द्वापर, कलि तथा मन्वन्तरसंज्ञक कालविभाग से विभक्त माना गया है; और कृतादि विभाग के अनुसार ही धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्यात्मक सात्त्विक भाव पादक्रम से न्यून कहागया है; और एक गुणोपाधिक कार्य ब्रह्म की उपासना कहीं नहीं है, किन्तु सर्वगुणोपाधिक कारण ब्रह्मही की उपासना सर्वत्र कही है; अत एव उनके सर्वगुणमय चरित्र इतिहास-पुराणों में जगमगा रहे हैं; और एककर्तृक लोकव्यवस्था मानने में एकत्रही राजस, सात्त्विक, तामस गुणों का उपसंहार है, वासनाभेद से वह ( अधिष्ठान ) चाहे राम-कृष्ण नाम से उपास्य हो वा विष्णु-शिव नाम से उपास्य हो; और उपास्य- प्राप्ति ( मोक्ष ) भक्ति-ज्ञान से है, भक्ति-ज्ञान की उत्पत्ति अन्तःकरण शुद्धि से कही है; ऐसी दशा में व्युत्थान काल में वर्णाश्रममर्यादा के बांधनेवाले मन्वादि तथा ज्ञाननिष्ठ कपिलादि, काल्पनिक सात्त्विक-राजस-तामस कल्प ( कोटि ) से क्यों घसीटे जाते हैं ? और यह खैंचातानी भगवान् वेद- पुरुष तक क्या नहीं पहुँची ? अवश्य पहुँच कर उनको ढीला करदिया ।
काल की दशा-
‘ भिन्ना व्याकृतिदण्डनेन शतधा वेदोऽर्थतः पाठ्यते तत्पोष्याः स्मृतयोऽवसन्नमनसोऽङ्गाङ्गात्समुद्धाम्यता'