मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभूमिका । १०३ हैं। परमेश्वर के निर्विशेषरूप का निरूपण ( अशब्दमस्पर्श- मरूपमव्ययं-' इस श्रुति में किया है और इसी अभिप्राय की ये श्रुतियां हैं- ‘ अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमपदेश्यमैकात्म्यप्र- त्ययसारम्प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः। ' माण्डूक्य. ‘यत्तददृश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं तद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः।' मुण्डक. ‘ यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति-’ इत्यादि। बृहदारण्यक. इन सिद्धान्त श्रुतियों से निर्विशेष ब्रह्म ( निराकार ) अर्थात् नाम-रूप आदि समस्त उपाधि से रहित केवल सच्चिदा- नन्द ज्ञात होता है । इसी कारण वह श्रुति-स्मृतिरूप नेत्रही से कथमपि देखने योग्य है अन्य नेत्रद्वारा नहीं देखा जा सकता। यही बात इन श्रुति-स्मृतियों से स्पष्ट है- ‘ पराञ्चिखानि व्यतृणत् स्वयंभूः तस्मात् पराङ् नान्तरात्मम् । कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैच्छ- दावृत्ते चक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ ' कठ. 'भावार्थ-परमेश्वर ने इन्द्रियों को आत्मा के ग्रहण करने ' में समर्थ नहीं बनाया इस कारण वे स्थूल पदार्थ ही का ग्रहण कर सकती हैं उस आत्मा के प्रत्यक्षकरने में असमर्थ हैं ।