भारतकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 649 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

भूमिका । १११ दायियों ने निर्विशेषवाद खण्डनपूर्वक सविशेषवाद की सिद्धि के लिये दुर्व्याख्याओं से भगवान् वेदव्यास के ब्रह्मसूत्रों को आकुल कर दिया है और मायावाद के विरोधी होकर भी श्रुति स्मृतियों को साधारण लोगों के लिये घोर मायावाद में पटक दिया है, एवं कुकर्म से जो प्रत्यवाय होता है वह धर्मशास्त्र में छिपा नहीं है । अब साधारण लोगों के भी समझ में आने योग्य निर्विशेष ब्रह्म की प्रतिपादक कुछ श्रुतियां दिखलाते हैं, जिनमें दृढ़ता के लिये वार वार उसी बात की चर्चा की गई है- 'यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥' ( निचाय्यतन्मृत्युमुखत्प्रमुच्यते ) केनोपनिषत्. कई एक कारणों से ब्रह्मसूत्र ( वेदान्तदर्शन ) का अर्थ वही माननीय (श्रवण-मनन-निदिध्यासनयोग्य) है जिसको भगवत्पादने शारीरक-भाष्य में लिखा है और जिसका विस्तार ईश-केन-कठ- प्रश्न-मुण्ड-माण्डूक्य-तैत्तिरीय-छान्दोग्य-बृहदारण्य-ऐतरेय उप- निषदों के भाष्यों में तथा श्री ६ गीताभाष्य में किया है ।